इस अध्याय में क्या होता है गरुड़ का प्रश्न: ज्ञान और भक्ति में भेद काकभुशुण्डि गरुड़ से कहते हैं कि ऐसी भक्ति छोड़कर केवल ज्ञान के लिए श्रम करने वाले घर की कामधेनु छोड़कर दूध के लिए आक खोजते हैं। शिव भवानी से कहते हैं कि गरुड़ ने हर्ष से कहा कि उनका संशय मिट गया, फिर पूछा: वेद कहते हैं ज्ञान के समान कुछ दुर्लभ नहीं, पर आपने लोमश के उपदेश का भक्ति जैसा आदर नहीं किया; दोनों में क्या अन्तर है? भुशुण्डि कहते हैं कि दोनों भव-खेद हरते हैं, फिर भी मुनि कुछ भेद बताते हैं। ज्ञान, वैराग्य, योग और विज्ञान पुरुष हैं, प्रबल; स्त्री-वर्ग स्वभाव से अबल कहा गया। धीर विरक्त पुरुष नारी को त्याग सकता है, पर ज्ञानी मुनि भी सुन्दर मुख देखकर विकल होते हैं, क्योंकि नारी प्रत्यक्ष माया है।
115.1 जे असि भगति जानि परिहरहीं । केवल ज्ञान हेतु श्रम करहीँ ॥ ते जड़ कामधेनु गृहँ त्यागी । खोजत आकु फिरहिँ पय लागी ॥
je asi bhagati jāni pariharahīṃ | kevala jñāna hetu śrama karahīm̐ || te jar̤a kāmadhenu gṛham̐ tyāgī | khojata āku phirahim̐ paya lāgī ||
115.2 सुनु खगेस हरि भगति बिहाई । जे सुख चाहहिँ आन उपाई ॥ ते सठ महासिन्धु बिनु तरनी । पैरि पार चाहहिँ जड़ करनी ॥
sunu khagesa hari bhagati bihāī | je sukha cāhahim̐ āna upāī || te saṭha mahāsindhu binu taranī | pairi pāra cāhahim̐ jar̤a karanī ||
115.3 सुनि भुसुंडि के बचन भवानी । बोलेउ गरुड़ हरषि मृदु बानी ॥ तव प्रसाद प्रभु मम उर माहीँ । संसय सोक मोह भ्रम नाहीं ॥
suni bhusuṃḍi ke bacana bhavānī | boleu garur̤a haraṣi mṛdu bānī || tava prasāda prabhu mama ura māhīm̐ | saṃsaya soka moha bhrama nāhīṃ ||
115.4 सुनेउँ पुनीत राम गुन ग्रामा । तुम्हरी कृपाँ लहेउँ बिश्रामा ॥ एक बात प्रभु पूछउँ तोही । कहहु बुझाइ कृपानिधि मोही ॥
suneum̐ punīta rāma guna grāmā | tumharī kṛpām̐ laheum̐ biśrāmā || eka bāta prabhu pūchaum̐ tohī | kahahu bujhāi kṛpānidhi mohī ||
115.5 कहहिँ सन्त मुनि बेद पुराना । नहिँ कछु दुर्लभ ज्ञान समाना ॥ सोइ मुनि तुम्ह सन कहेउ गोसाँई । नहिं आदरेहु भगति की नाईं ॥
kahahim̐ santa muni beda purānā | nahim̐ kachu durlabha jñāna samānā || soi muni tumha sana kaheu gosām̐ī | nahiṃ ādarehu bhagati kī nāīṃ ||
115.6 ज्ञानहिं भगतिहि अन्तर केता । सकल कहहु प्रभु कृपा निकेता ॥ सुनि उरगारि बचन सुख माना । सादर बोलेउ काग सुजाना ॥
jñānahiṃ bhagatihi antara ketā | sakala kahahu prabhu kṛpā niketā || suni uragāri bacana sukha mānā | sādara boleu kāga sujānā ||
115.7 भगतिहि ज्ञानहि नहिँ कछु भेदा । उभय हरहिं भव सम्भव खेदा ॥ नाथ मुनीस कहहिँ कछु अन्तर । सावधान सोउ सुनु बिहंगबर ॥
bhagatihi jñānahi nahim̐ kachu bhedā | ubhaya harahiṃ bhava sambhava khedā || nātha munīsa kahahim̐ kachu antara | sāvadhāna sou sunu bihaṃgabara ||
115.8 ज्ञान विराग जोग विज्ञाना । ये सब पुरुष सुनहु हरिजानां ॥ पुरुष प्रताप प्रबल सम भाँती । अबला अबल सहज जड़ जाती ॥
jñāna virāga joga vijñānā | ye saba puruṣa sunahu harijānāṃ || puruṣa pratāpa prabala sama bhām̐tī | abalā abala sahaja jar̤a jātī ||
दो॰ 115 (क) दोहा पुरुष त्यागि सक नारिहि, जो बिरक्त मति धीर । न तु कामी विषयाबस, बिमुख जो पद रघुबीर ॥
puruṣa tyāgi saka nārihi, jo birakta mati dhīra | na tu kāmī viṣayābasa, bimukha jo pada raghubīra ||
115.सो॰ 115 (ख) सोरठा सोउ मुनि ग्याननिधान मृगनयनी बिधु मुख निरखि । बिकल होहिँ हरिजान, नारि बिस्व माया प्रगट ॥
sou muni gyānanidhāna mṛganayanī bidhu mukha nirakhi | bikala hohim̐ harijāna, nāri bisva māyā pragaṭa ||
पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0
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