इस अध्याय में क्या होता है लोमश का शाप: बालक काग बना काकभुशुण्डि गरुड़ को बताते हैं कि लोमश के तर्क के बीच वे मन में क्या सोचते रहे। जो सबका हित चाहे, क्या वह दुःखी हो? हरिनिन्दक क्या सुखी हो? हरिभक्ति के समान कौन लाभ, और मनुष्य-देह पाकर राम को न भजने के समान कौन हानि? वे बार-बार सगुण पक्ष पर अड़े रहे। अन्त में मुनि क्रोध से बोले: मूर्ख, तू उत्तर-प्रत्युत्तर करता है, सत्य पर विश्वास नहीं करता और कौवे की तरह सबसे डरता है; जा, कौवा हो जा। भुशुण्डि ने शाप सिर पर लिया, न भय आया न दीनता; तुरन्त काग बने, प्रणाम किया और राम को सुमिरते हर्ष से उड़ चले। शिव उमा से कहते हैं: राम-भक्त जगत को प्रभुमय देखते हैं, फिर विरोध किससे करें?
112.1 कबहुँ-कि दुख सब कर हित ताकें । तेहि कि दरिद्र परस मनि जाकें ॥ परद्रोही की होहिँ निसङ्का । कामी पुनि कि रहहिं अकलङ्का ॥
kabahum̐-ki dukha saba kara hita tākeṃ | tehi ki daridra parasa mani jākeṃ || paradrohī kī hohim̐ nisaṅkā | kāmī puni ki rahahiṃ akalaṅkā ||
112.2 बंस कि रह द्विज अनहित कीन्हें । कर्म कि होहिँ स्वरूपहि चीन्हें ॥ काहू सुमति कि खल संग जामी । सुभ गति पाव कि परत्रिय-गामी ॥
baṃsa ki raha dvija anahita kīnheṃ | karma ki hohim̐ svarūpahi cīnheṃ || kāhū sumati ki khala saṃga jāmī | subha gati pāva ki paratriya-gāmī ||
112.3 भव कि परहिँ परमात्मा-बिन्दक । सुखी कि होहिं कबहुँ हरिनिंदक ॥ राज कि रहइ नीति बिनु जानें । अघ कि रहहिं हरिचरित बखानें ॥
bhava ki parahim̐ paramātmā-bindaka | sukhī ki hohiṃ kabahum̐ hariniṃdaka || rāja ki rahai nīti binu jāneṃ | agha ki rahahiṃ haricarita bakhāneṃ ||
112.4 पावन जल कि पुन्य बिनु होई । बिनु अघ अजस कि पावइ कोई ॥ लाभ कि किछु हरि भगति समाना । जेहि गावहिं श्रुति सन्त पुराना ॥
pāvana jala ki punya binu hoī | binu agha ajasa ki pāvai koī || lābha ki kichu hari bhagati samānā | jehi gāvahiṃ śruti santa purānā ||
112.5 हानि कि जग एहि सम किछु भाई । भजिअ न रामहि नर तनु पाई ॥ अघ कि पिसुनता सम कछु आना । धर्म कि दया सरिस हरिजाना ॥
hāni ki jaga ehi sama kichu bhāī | bhajia na rāmahi nara tanu pāī || agha ki pisunatā sama kachu ānā | dharma ki dayā sarisa harijānā ||
112.6 एहि बिधि अमित जुगुति मन गुनऊँ । मुनि उपदेस न सादर सुनऊँ ॥ पुनि पुनि सगुन पच्छ में रोपा । सन्न मुनि बाले बचन सकोपा ॥
ehi bidhi amita juguti mana gunaūm̐ | muni upadesa na sādara sunaūm̐ || puni puni saguna paccha meṃ ropā | sanna muni bāle bacana sakopā ||
112.7 मूढ़ परम सिख देउँ न मानसि । उत्तर प्रतिउत्तर बहु आनसि ॥ सत्य बचन बिस्वास न करही । बायस इव सबही ते डरही ॥
mūr̤ha parama sikha deum̐ na mānasi | uttara pratiuttara bahu ānasi || satya bacana bisvāsa na karahī | bāyasa iva sabahī te ḍarahī ||
112.8 सठ स्वपच्छ तब हृदयँ विसाला । सपदि होहि पच्छी चंडाला ॥ लीन्ह साप मैं सीस चढ़ाई । नहिँ कछु भय न दीनता आई ॥
saṭha svapaccha taba hṛdayam̐ visālā | sapadi hohi pacchī caṃḍālā || līnha sāpa maiṃ sīsa car̤hāī | nahim̐ kachu bhaya na dīnatā āī ||
दो॰ 112 (क) दोहा तुरत भयउँ मैं काग तब, पुनि मुनि पद सिर नाइ । सुमिरि राम रघुबंस मनि, हरषित चलेउँ उड़ाइ ॥
turata bhayaum̐ maiṃ kāga taba, puni muni pada sira nāi | sumiri rāma raghubaṃsa mani, haraṣita caleum̐ ur̤āi ||
दो॰ 112 (ख) दोहा उमा जे राम चरन रत, बिगत काम मद क्रोध । निज प्रक्षु मय देखहिँ जगत, केहि सन कहिँ बिरोध ॥
umā je rāma carana rata, bigata kāma mada krodha | nija prakṣu maya dekhahim̐ jagata, kehi sana kahim̐ birodha ||
पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0
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