तब मुनिष रघुपति गुन गाथा । कहे कछुक सादर खगनाथा ॥
ब्रह्मज्ञान रत मुनि विज्ञानी । मोहि परम अधिकारी जानी ॥
taba muniṣa raghupati guna gāthā | kahe kachuka sādara khaganāthā ||
brahmajñāna rata muni vijñānī | mohi parama adhikārī jānī ||
10 श्लोक · 111 में से 130
काकभुशुण्डि गरुड़ को बताते हैं कि लोमश ने पहले रघुपति के कुछ गुण गाए, फिर ब्रह्मज्ञान में रत उस विज्ञानी मुनि ने उन्हें अधिकारी जानकर निर्गुण ब्रह्म का उपदेश आरम्भ किया: अजन्मा, अद्वैत, अनाम, मन से परे, अविनाशी, और जीव से वैसा ही अभिन्न जैसे जल और लहर। वह मत भुशुण्डि के हृदय में न उतरा। उन्होंने कहा, मेरा मन राम-भक्ति के जल की मछली है; पहले अपनी आँखों से रघुराई को देख लूँ, फिर निर्गुण सुनूँगा। मुनि ने फिर सगुण का खण्डन किया, बालक ने हठ से उत्तर-प्रत्युत्तर किया, और मुनि के शरीर पर क्रोध के चिह्न उभरे। चन्दन को भी बहुत रगड़ो तो आग निकलती है। भुशुण्डि मन में सोचने लगे: द्वैतबुद्धि बिना क्रोध कैसा, और अज्ञान बिना द्वैत कैसा?
तब मुनिष रघुपति गुन गाथा । कहे कछुक सादर खगनाथा ॥
ब्रह्मज्ञान रत मुनि विज्ञानी । मोहि परम अधिकारी जानी ॥
taba muniṣa raghupati guna gāthā | kahe kachuka sādara khaganāthā ||
brahmajñāna rata muni vijñānī | mohi parama adhikārī jānī ||
लागे करन ब्रह्म उपदेसा । अज अद्वेत अगुन हृदयेसा ॥
अकल अनीह अनाम अरूपा । अनुभव गम्य अखंड अनूपा ॥
lāge karana brahma upadesā | aja adveta aguna hṛdayesā ||
akala anīha anāma arūpā | anubhava gamya akhaṃḍa anūpā ||
मन गोतीत अमल अबिनासी । निर्विकार निरवधि सुख रासी ॥
सो तैं ताहि तोहि नहिँ भेदा । बारि बीच इव गावहि बेदा ॥
mana gotīta amala abināsī | nirvikāra niravadhi sukha rāsī ||
so taiṃ tāhi tohi nahim̐ bhedā | bāri bīca iva gāvahi bedā ||
बिबिध भाँति मोहि मुनि समुझावा । निर्गुन मत मम हृदयँ न आवा ॥
पुनि मैं कहेउँ नाइ पद सीसा । सगुन उपासन कहहु मुनीसा ॥
bibidha bhām̐ti mohi muni samujhāvā | nirguna mata mama hṛdayam̐ na āvā ||
puni maiṃ kaheum̐ nāi pada sīsā | saguna upāsana kahahu munīsā ||
राम भगति जल मम मन मीना । किमि बिलगाइ मुनीस प्रबीना ॥
सोइ उपदेस काहु करि दाया । निज नयनन्हि देखौं रघुराया ॥
rāma bhagati jala mama mana mīnā | kimi bilagāi munīsa prabīnā ||
soi upadesa kāhu kari dāyā | nija nayananhi dekhauṃ raghurāyā ||
भरि लोचन बिलोकि अवधेसा । तब सुनिहउँ निर्गुन उपदेसा ॥
मुनि पुनि कहि हरिकथा अनूपा । खंडि सगुन मत अगुन निरूपा ॥
bhari locana biloki avadhesā | taba sunihaum̐ nirguna upadesā ||
muni puni kahi harikathā anūpā | khaṃḍi saguna mata aguna nirūpā ||
तब मैं निर्गुन मत करि दूरी । सगुन निरूपउँ करि हठ भूरी ॥
उत्तर प्रतिउत्तर में कीन्हा । मुनि तनु भये क्रोध के चीन्हा ॥
taba maiṃ nirguna mata kari dūrī | saguna nirūpaum̐ kari haṭha bhūrī ||
uttara pratiuttara meṃ kīnhā | muni tanu bhaye krodha ke cīnhā ||
सुनु प्रभु बहुत अवज्ञा किये । उपज क्रोध ज्ञानिन्ह के हिएँ ॥
अति संघरषन जौँ कर कोई । अनल प्रगट चन्दन से होई ॥
sunu prabhu bahuta avajñā kiye | upaja krodha jñāninha ke hiem̐ ||
ati saṃgharaṣana jaum̐ kara koī | anala pragaṭa candana se hoī ||
दो बारम्बार सकोप मुनि, करइ निरूपन ज्ञान ।
मैं अपनें मन बैठ तब, करउँ बिबिध अनुमान ॥
do bārambāra sakopa muni, karai nirūpana jñāna |
maiṃ apaneṃ mana baiṭha taba, karaum̐ bibidha anumāna ||
क्रोध कि द्वेतबुद्धि बिनु, द्वैत-कि बिनु अज्ञान ।
माया बस परिछिन्न जड़, जीव कि इस समान ॥
krodha ki dvetabuddhi binu, dvaita-ki binu ajñāna |
māyā basa parichinna jar̤a, jīva ki isa samāna ||
पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0