इस अध्याय में क्या होता है लोमश प्रसन्न हुए, राम-मन्त्र दिया काकभुशुण्डि गरुड़ से कहते हैं कि ऋषि का दोष नहीं था। हृदय के प्रेरक श्रीराम ने मुनि की बुद्धि भोली करके उनके प्रेम की परीक्षा ली, फिर बुद्धि फेर दी। काग की शीलता और विश्वास देखकर लोमश चकित हुए और पछताए। उन्होंने आदर से बुलाकर सन्तोष दिया, राम-मन्त्र दिया और बालरूप राम का ध्यान बताया, जो भुशुण्डि को सबसे प्रिय था। कुछ समय रखकर रामचरितमानस सुनाया, जो शम्भु की कृपा से मिला गुप्त सरोवर है, और कहा कि राम-भक्ति से रहित लोगों से इसे कभी न कहना। फिर सिर पर हाथ रखकर आशीर्वाद दिया: अविरल भक्ति, इच्छामृत्यु, इच्छारूप, और आश्रम के एक योजन तक अविद्या न व्यापे।
113.1 सुनु खगेस नहिं कछु रिषि दूषन । उर प्रेरक रघुबंस-विभूषन ॥ कृपासिन्धु मुनि मति करि भोरी । लीन्ही प्रेम परिच्छा मोरी ॥
sunu khagesa nahiṃ kachu riṣi dūṣana | ura preraka raghubaṃsa-vibhūṣana || kṛpāsindhu muni mati kari bhorī | līnhī prema paricchā morī ||
113.2 मन बच क्रम मोहि निज जन जाना । मुनि मति पुनि फेरी भगवाना ॥ रिषि मम महत सीलता देखी । राम चरन बिस्वास बिसेखी ॥
mana baca krama mohi nija jana jānā | muni mati puni pherī bhagavānā || riṣi mama mahata sīlatā dekhī | rāma carana bisvāsa bisekhī ||
113.3 अति बिसमय पुनि पुनि पछिताई । सादर मुनि मोहि लीन्ह बोलाई ॥ मम परितोष बिबिध विधि कीन्हा । हरषित राममन्त्र तब दीन्हा ॥
ati bisamaya puni puni pachitāī | sādara muni mohi līnha bolāī || mama paritoṣa bibidha vidhi kīnhā | haraṣita rāmamantra taba dīnhā ||
113.4 बालक रूप राम कर ध्याना । कहेउ मोहि मुनि कृपानिधाना ॥ सुन्दर सुखद मिहि अति भावा । सो प्रथमहिँ मैं तुम्हहिँ सुनावा ॥
bālaka rūpa rāma kara dhyānā | kaheu mohi muni kṛpānidhānā || sundara sukhada mihi ati bhāvā | so prathamahim̐ maiṃ tumhahim̐ sunāvā ||
113.5 मुनि मोहि कछुक काल तहँ राखा । रामचरितमानस तब भाखा ॥ सादर मोहि यह कथा सुनाई । पुनि बोले मुनि गिरा सुहाई ॥
muni mohi kachuka kāla taham̐ rākhā | rāmacaritamānasa taba bhākhā || sādara mohi yaha kathā sunāī | puni bole muni girā suhāī ||
113.6 रामचरित सर गुप्त सुहावा । सम्भु प्रसाद तात में पावा ॥ तोहि निज भगत राम कर जानी । तातें मैं सब कहेउँ बखानी ॥
rāmacarita sara gupta suhāvā | sambhu prasāda tāta meṃ pāvā || tohi nija bhagata rāma kara jānī | tāteṃ maiṃ saba kaheum̐ bakhānī ||
113.7 राम भगति जिन्ह कें उर नाहीं । कबहुँ न तात कहिय तिन्ह पाहीं ॥ मुनि मोहि बिबिध भाँति समुझावा । मैं सप्रेम मुनि पद सिर नावा ॥
rāma bhagati jinha keṃ ura nāhīṃ | kabahum̐ na tāta kahiya tinha pāhīṃ || muni mohi bibidha bhām̐ti samujhāvā | maiṃ saprema muni pada sira nāvā ||
113.8 निज कर कमल परसि मम सीसा । हरषित आसिष दीन्हि मुनीसा ॥ राम भगति अबिरल उर तोरें । बसिहि सदा प्रसाद अब मोरें ॥
nija kara kamala parasi mama sīsā | haraṣita āsiṣa dīnhi munīsā || rāma bhagati abirala ura toreṃ | basihi sadā prasāda aba moreṃ ||
दो॰ 113 (क) दोहा दो सदा राम प्रिय होहु तुम्ह, सुभ गुन भवन अमान । कामरूप इच्धामरन, ज्ञान बिराग निधान ॥
do sadā rāma priya hohu tumha, subha guna bhavana amāna | kāmarūpa icdhāmarana, jñāna birāga nidhāna ||
दो॰ 113 (ख) दोहा जेहि आश्रम तुम्ह बसब पुनि, सुमिरत श्रीभगवन्त । व्यापिहि तहँ न अबिद्या, जोजन एक प्रजन्त ॥
jehi āśrama tumha basaba puni, sumirata śrībhagavanta | vyāpihi taham̐ na abidyā, jojana eka prajanta ||
पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0
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