उत्तरकाण्ड

अध्याय 103: कलि में राम-गुणगान ही पर्याप्त

6 श्लोक · 103 में से 130

इस अध्याय में क्या होता है

कलि में राम-गुणगान ही पर्याप्त

काकभुशुण्डि गरुड़ के सामने चारों युगों की तुलना करते हैं। सतयुग में लोग योगी होकर हरि-ध्यान से तरते हैं। त्रेता में प्रभु को अर्पित यज्ञों से तरते हैं। द्वापर में रघुपति के चरणों की पूजा से तरते हैं। कलि में न योग है, न यज्ञ, न ज्ञान; एक आधार राम का गुणगान है। जो सब भरोसा छोड़कर प्रेम से गुण गाता है, वह निःसन्देह तरता है, क्योंकि कलि में नाम का प्रताप प्रत्यक्ष है। कलि की एक और कृपा यह है कि मन के पुण्य फल देते हैं, मन के पाप नहीं गिने जाते। विश्वास हो तो इसके समान कोई युग नहीं। धर्म के चार चरणों में अब दान प्रधान है; जैसे-तैसे दिया दान भी कल्याण करता है।

103.1

कृतजुग सब जोगी विज्ञानी । करि हरि ध्यान तरहिँ भव प्रानी ॥
त्रेताँ विविध जग्य नर करहीं । प्रभुहि समर्पि करम भव तरहीं ॥

kṛtajuga saba jogī vijñānī | kari hari dhyāna tarahim̐ bhava prānī ||
tretām̐ vividha jagya nara karahīṃ | prabhuhi samarpi karama bhava tarahīṃ ||

103.2

द्वापर करि रघुपति पद पूजा । नर भव तरहिं उपाय न दूजा ॥
कलिजुग केवल हरि गुन गाहा । गावत नर पावहिँ भव थाहा ॥

dvāpara kari raghupati pada pūjā | nara bhava tarahiṃ upāya na dūjā ||
kalijuga kevala hari guna gāhā | gāvata nara pāvahim̐ bhava thāhā ||

103.3

कलिजुग जोग न जज्ञ न ज्ञाना । एक अधार राम गुन गाना ॥
सब भरोस तजि जो भज रामहि । प्रेम समेत गाव गुन ग्रामहि ॥

kalijuga joga na jajña na jñānā | eka adhāra rāma guna gānā ||
saba bharosa taji jo bhaja rāmahi | prema sameta gāva guna grāmahi ||

103.4

सोइ भव तर कछु संसय नाहीँ । नाम प्रताप प्रगट कलि माहीं ॥
कलि कर एक पुनीत प्रतापा । मानस पुन्य होहिँ नहिँ पापा ॥

soi bhava tara kachu saṃsaya nāhīm̐ | nāma pratāpa pragaṭa kali māhīṃ ||
kali kara eka punīta pratāpā | mānasa punya hohim̐ nahim̐ pāpā ||

दो॰ 103 (क)दोहा

कलिजुग सम जुग आन नहिँ, मैं नर कर विस्वास ।
गाइ राम गुन गन बिमलँ, भव तर बिनहिं प्रयास ॥

kalijuga sama juga āna nahim̐, maiṃ nara kara visvāsa |
gāi rāma guna gana bimalam̐, bhava tara binahiṃ prayāsa ||

दो॰ 103 (ख)दोहा

प्रगट चारि पद धरम के, कलिल महँ एक प्रधान ।
जेन केन विधि दीन्हें, दान करइ कल्यान ॥

pragaṭa cāri pada dharama ke, kalila maham̐ eka pradhāna |
jena kena vidhi dīnheṃ, dāna karai kalyāna ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0