उत्तरकाण्ड

अध्याय 104: युगों के गुण, और अवध से प्रस्थान

6 श्लोक · 104 में से 130

इस अध्याय में क्या होता है

युगों के गुण, और अवध से प्रस्थान

काकभुशुण्डि गरुड़ को समझाते हैं कि राम की माया से हर युग का धर्म हर समय हर हृदय में उठता है। शुद्ध सत्त्व, समता और प्रसन्न मन सतयुग है। अधिक सत्त्व, कुछ रज और कर्म में रुचि त्रेता है। अधिक रज, थोड़ा सत्त्व और तम, मन में हर्ष और भय, यह द्वापर है। अधिक तम और चारों ओर विरोध कलि है। बुद्धिमान अपने मन में युगधर्म पहचानकर धर्म पकड़ते हैं। जिसे रघुपति के चरणों में प्रीति है, उसे कालधर्म नहीं व्यापता; नट का कपट उसके अपने सेवक को नहीं ठगता। फिर कथा लौटती है: बहुत वर्ष अवध में रहने के बाद अकाल पड़ा और वे परदेस चले गए।

104.1

नित जुग धर्म होहिँ सब केरे । हृदयँ राम माया के प्रेरे ॥
सुद्ध सत्व समता विज्ञाना । कृत प्रभाव प्रसन्न बन जाना ॥

nita juga dharma hohim̐ saba kere | hṛdayam̐ rāma māyā ke prere ||
suddha satva samatā vijñānā | kṛta prabhāva prasanna bana jānā ||

104.2

सत्व बहुत रज कछु रति कर्मा । सब विधि रुख त्रेता कर धर्मा ॥
बहु रज स्वल्प सत्व कछु तामस । द्वापर धर्म हरष भय मानस ॥

satva bahuta raja kachu rati karmā | saba vidhi rukha tretā kara dharmā ||
bahu raja svalpa satva kachu tāmasa | dvāpara dharma haraṣa bhaya mānasa ||

104.3

तामस बहुत रजोगुन थोरा । कलि प्रभाव बिरोध चहुँ ओरा ॥
बुध जुग धरम जानि मन माहीं । तजि अधर्म रति धर्म कराहीं ॥

tāmasa bahuta rajoguna thorā | kali prabhāva birodha cahum̐ orā ||
budha juga dharama jāni mana māhīṃ | taji adharma rati dharma karāhīṃ ||

104.4

काल धरम नहिं ब्यापहिँ ताही । रघुपति चरन प्रीति अति जाही ॥
नट कृत बिकट कपट खगराया । नट सेवकहि न व्यापइ माया ॥

kāla dharama nahiṃ byāpahim̐ tāhī | raghupati carana prīti ati jāhī ||
naṭa kṛta bikaṭa kapaṭa khagarāyā | naṭa sevakahi na vyāpai māyā ||

दो॰ 104 (क)दोहा

हरि माया कृत दोष गुन, बिनु हरि भजन न जाहिँ ।
भजिअ राम तजि काम सब, अस बिचारि मन माहिँ ॥

hari māyā kṛta doṣa guna, binu hari bhajana na jāhim̐ |
bhajia rāma taji kāma saba, asa bicāri mana māhim̐ ||

दो॰ 104 (ख)दोहा

तेहि कलिकाल बरष बहु, बसेउँ अवध बिहगेस ।
परेउ दुकाल बिपति बस, तब मैं गयउँ बिदेस ॥

tehi kalikāla baraṣa bahu, baseum̐ avadha bihagesa |
pareu dukāla bipati basa, taba maiṃ gayaum̐ bidesa ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0