उत्तरकाण्ड

अध्याय 102: कलि का दुःख और उसका एक गुण

5 श्लोक · 102 में से 130

इस अध्याय में क्या होता है

कलि का दुःख और उसका एक गुण

काकभुशुण्डि गरुड़ के सामने कलि के छन्द पूरे करते हैं। लोग भूखे, निर्धन और रोगी हैं, बिना कारण झगड़ते हैं, पचास-साठ वर्ष ही जीते हैं, पर घमण्ड ऐसा मानो कल्पान्त तक रहेंगे। कलि ने मनुष्यों को ऐसा बिगाड़ा कि बहन-बेटी का भी विचार नहीं रहा। सन्तोष और शीतलता गई, ईर्ष्या और कठोर वचन फैल गए, वर्णाश्रम का आचार मिट गया, दम, दान और दया कोई नहीं जानता। फिर भी वे गरुड़ से कहते हैं, दोषों के इस भण्डार में एक बड़ा गुण है: बिना परिश्रम उद्धार। सतयुग, त्रेता और द्वापर में पूजा, यज्ञ और योग से जो गति मिलती, कलि में लोग वही केवल हरिनाम से पाते हैं।

102.छं॰ 1छन्द

अबला कच भूषन भूरि छुधा । धनहीन दुखी ममता बहुधा ।
सुख चाहहिँ मूढ़ न धर्म रता । मति थोरि कठोरि न कोमलता ॥
नर पीड़ित रोग न भोग कहाँ । अभिमान बिरोध अकारनहीं ।
लघु जीवन सम्बत पञ्च दसा । कलपांत न नास गुमानु असा ॥

abalā kaca bhūṣana bhūri chudhā | dhanahīna dukhī mamatā bahudhā |
sukha cāhahim̐ mūr̤ha na dharma ratā | mati thori kaṭhori na komalatā ||
nara pīr̤ita roga na bhoga kahām̐ | abhimāna birodha akāranahīṃ |
laghu jīvana sambata pañca dasā | kalapāṃta na nāsa gumānu asā ||

102.छं॰ 2छन्द

कलिकाल बिहाल किये मनुजा । नहिँ मानत की अनुजा तनुजा ।
नहिं तोष विचार न सीतलता । सब जाति कुजाति भए मगता ॥
इरिषा परुखाच्छर लोलुपता । भरि पूरि रही समता बिगता ।
सब लोग बियोग बिसोक हुए । बरनाश्रम धर्म अचार गये ॥

kalikāla bihāla kiye manujā | nahim̐ mānata kī anujā tanujā |
nahiṃ toṣa vicāra na sītalatā | saba jāti kujāti bhae magatā ||
iriṣā parukhācchara lolupatā | bhari pūri rahī samatā bigatā |
saba loga biyoga bisoka hue | baranāśrama dharma acāra gaye ||

102.छं॰ 3छन्द

दम दान दया नहिं जानपनी । जड़ता परबञ्चनताति घनी ।
तनु पोषक नारि नरा सगरे । परनिंदक जे जग में बगरे ॥

dama dāna dayā nahiṃ jānapanī | jar̤atā parabañcanatāti ghanī |
tanu poṣaka nāri narā sagare | paraniṃdaka je jaga meṃ bagare ||

दो॰ 102 (क)दोहा

सुनु व्यालारि काल कलि, मल अवगुन आगार ।
गुनउँ बहुत कलिजुग कर, बिनु प्रयास निस्तार ॥

sunu vyālāri kāla kali, mala avaguna āgāra |
gunaum̐ bahuta kalijuga kara, binu prayāsa nistāra ||

दो॰ 102 (ख)दोहा

कृतजुग त्रेता द्वापर, पूजा मख अरु जोग ।
जो गति होइ सो कलि हरि, नाम ते पावहिं लोग ॥

kṛtajuga tretā dvāpara, pūjā makha aru joga |
jo gati hoi so kali hari, nāma te pāvahiṃ loga ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0