काकभुशुण्डि गरुड़ के सामने कलि के छन्द पूरे करते हैं। लोग भूखे, निर्धन और रोगी हैं, बिना कारण झगड़ते हैं, पचास-साठ वर्ष ही जीते हैं, पर घमण्ड ऐसा मानो कल्पान्त तक रहेंगे। कलि ने मनुष्यों को ऐसा बिगाड़ा कि बहन-बेटी का भी विचार नहीं रहा। सन्तोष और शीतलता गई, ईर्ष्या और कठोर वचन फैल गए, वर्णाश्रम का आचार मिट गया, दम, दान और दया कोई नहीं जानता। फिर भी वे गरुड़ से कहते हैं, दोषों के इस भण्डार में एक बड़ा गुण है: बिना परिश्रम उद्धार। सतयुग, त्रेता और द्वापर में पूजा, यज्ञ और योग से जो गति मिलती, कलि में लोग वही केवल हरिनाम से पाते हैं।
कलिकाल बिहाल किये मनुजा । नहिँ मानत की अनुजा तनुजा । नहिं तोष विचार न सीतलता । सब जाति कुजाति भए मगता ॥ इरिषा परुखाच्छर लोलुपता । भरि पूरि रही समता बिगता । सब लोग बियोग बिसोक हुए । बरनाश्रम धर्म अचार गये ॥