उत्तरकाण्ड

अध्याय 101: कलि पर छन्द: घर, राजा और अकाल

5 श्लोक · 101 में से 130

इस अध्याय में क्या होता है

कलि पर छन्द: घर, राजा और अकाल

तीन छन्दों में काकभुशुण्डि गरुड़ के सामने कलि का चित्र खींचते हैं। यति घर सँवारने में धन लुटाते, तपस्वी धनी और गृहस्थ दरिद्र हो गए। लोग सती पत्नी को निकालकर दासी घर लाते। पुत्र विवाह तक ही माता-पिता को मानते; फिर ससुराल प्यारी और अपना कुटुम्ब शत्रु। राजा पाप में रत होकर मनमाना दण्ड देते। धन ही कुलीनता बन गया; जनेऊ ही ब्राह्मण का चिह्न, नंगा शरीर ही तपस्वी का। जो वेद-पुराण न माने, वही हरिभक्त कहलाता। बार-बार अकाल पड़ता है। लोग जप, यज्ञ और दान तामस भाव से करते हैं, इसलिए देवता नहीं बरसते और बोया धान नहीं उगता।

101.छं॰ 1छन्द

बहु दाम सँवारहिँ धाम जती । विषया हरि लीन्हि न रही विरती ।
तपसी धनवन्त दरिद्र गृही । कलि कौतुक तात न जात कही ॥
कुलवंति निकारहिं नारि सती । गृह आनहिं चेरि निबेरि गती ।
सुत मानहिं मातु पिता तब लौँ । अबलानन दीख नहीं जब लै ॥

bahu dāma sam̐vārahim̐ dhāma jatī | viṣayā hari līnhi na rahī viratī |
tapasī dhanavanta daridra gṛhī | kali kautuka tāta na jāta kahī ||
kulavaṃti nikārahiṃ nāri satī | gṛha ānahiṃ ceri niberi gatī |
suta mānahiṃ mātu pitā taba laum̐ | abalānana dīkha nahīṃ jaba lai ||

101.छं॰ 2छन्द

ससुरारि पिआरि लगी जब तैं । रिपु रूप कुटुम्ब भए तब तेँ ।
नृप पाप-परायन धर्म नहीं । करि दंड बिडम्ब प्रजा नितहीं ॥
धनवन्त कुलीन मलीन अपी । द्विज चिन्ह जनेउ उघार तपी ।
नहिँ मान पुरान न बेदहि जो । हरि सेवक सन्त सही कलि सो ॥

sasurāri piāri lagī jaba taiṃ | ripu rūpa kuṭumba bhae taba tem̐ |
nṛpa pāpa-parāyana dharma nahīṃ | kari daṃḍa biḍamba prajā nitahīṃ ||
dhanavanta kulīna malīna apī | dvija cinha janeu ughāra tapī |
nahim̐ māna purāna na bedahi jo | hari sevaka santa sahī kali so ||

101.छं॰ 3छन्द

कबि बृन्द उदार दुनी न सुनी । गुन दूषक ब्रात न कोपि गुनी ।
कलि बारहिँ बार दुकाल परै । बिनु अन्न दुखी सब लोग मरै ॥

kabi bṛnda udāra dunī na sunī | guna dūṣaka brāta na kopi gunī |
kali bārahim̐ bāra dukāla parai | binu anna dukhī saba loga marai ||

दो॰ 101 (क)दोहा

सुनु खगेस कलि कपट हठ, दम्भ द्वेष पाखंड ।
मान मोह मारादि मद, व्यापि रहे ब्रह्मंड ॥

sunu khagesa kali kapaṭa haṭha, dambha dveṣa pākhaṃḍa |
māna moha mārādi mada, vyāpi rahe brahmaṃḍa ||

दो॰ 101 (ख)दोहा

तामस धर्म करहिँ नर, जप तप ब्रत मख दान ।
देव न बरषहिँ धरनीं बये न जामहिं धान ॥

tāmasa dharma karahim̐ nara, japa tapa brata makha dāna |
deva na baraṣahim̐ dharanīṃ baye na jāmahiṃ dhāna ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0