तीन छन्दों में काकभुशुण्डि गरुड़ के सामने कलि का चित्र खींचते हैं। यति घर सँवारने में धन लुटाते, तपस्वी धनी और गृहस्थ दरिद्र हो गए। लोग सती पत्नी को निकालकर दासी घर लाते। पुत्र विवाह तक ही माता-पिता को मानते; फिर ससुराल प्यारी और अपना कुटुम्ब शत्रु। राजा पाप में रत होकर मनमाना दण्ड देते। धन ही कुलीनता बन गया; जनेऊ ही ब्राह्मण का चिह्न, नंगा शरीर ही तपस्वी का। जो वेद-पुराण न माने, वही हरिभक्त कहलाता। बार-बार अकाल पड़ता है। लोग जप, यज्ञ और दान तामस भाव से करते हैं, इसलिए देवता नहीं बरसते और बोया धान नहीं उगता।
ससुरारि पिआरि लगी जब तैं । रिपु रूप कुटुम्ब भए तब तेँ । नृप पाप-परायन धर्म नहीं । करि दंड बिडम्ब प्रजा नितहीं ॥ धनवन्त कुलीन मलीन अपी । द्विज चिन्ह जनेउ उघार तपी । नहिँ मान पुरान न बेदहि जो । हरि सेवक सन्त सही कलि सो ॥
sasurāri piāri lagī jaba taiṃ | ripu rūpa kuṭumba bhae taba tem̐ | nṛpa pāpa-parāyana dharma nahīṃ | kari daṃḍa biḍamba prajā nitahīṃ || dhanavanta kulīna malīna apī | dvija cinha janeu ughāra tapī | nahim̐ māna purāna na bedahi jo | hari sevaka santa sahī kali so ||