पर त्रिय लम्पट कपट सयाने । मोह द्रोह ममता लपटाने ॥
तेइ अभेद-वादी ज्ञानी नर । देखा मैं चरित्र कलिजुग कर ॥
para triya lampaṭa kapaṭa sayāne | moha droha mamatā lapaṭāne ||
tei abheda-vādī jñānī nara | dekhā maiṃ caritra kalijuga kara ||
7 श्लोक · 100 में से 130
काकभुशुण्डि गरुड़ को उस युग की और बातें बताते हैं। लम्पट, कपटी, द्रोह में लिपटे लोग स्वयं को अभेदवादी ज्ञानी कहते; स्वयं डूबते और सन्मार्ग वालों को भी गिराते, और तर्क से श्रुति को दूषित करने वाले कल्प-कल्प नरक में पड़ते हैं। पत्नी मरने और घर उजड़ने पर नीच जाति के लोग सिर मुँड़ाकर संन्यासी बनते और ब्राह्मणों से पाँव पुजवाते। ब्राह्मण निरक्षर और लोभी हो गए; शूद्र ऊँचे आसन पर बैठ पुराण कहने लगे। सब मनमाना आचार करते। वर्णसंकर हुआ और हर मर्यादा टूटी। श्रुतिसम्मत, वैराग्य-युक्त हरिभक्ति के पथ पर कोई नहीं चलता, सब नये पन्थ गढ़ते हैं।
पर त्रिय लम्पट कपट सयाने । मोह द्रोह ममता लपटाने ॥
तेइ अभेद-वादी ज्ञानी नर । देखा मैं चरित्र कलिजुग कर ॥
para triya lampaṭa kapaṭa sayāne | moha droha mamatā lapaṭāne ||
tei abheda-vādī jñānī nara | dekhā maiṃ caritra kalijuga kara ||
आपु गये अरु तिन्हहूँ घालहिँ । जे कहुँ सत-मारग प्रतिपालहिँ ॥
कल्प कल्प अरि एक एक नरका । परहिँ जे दूषहिँ श्रुति करि तरका ॥
āpu gaye aru tinhahūm̐ ghālahim̐ | je kahum̐ sata-māraga pratipālahim̐ ||
kalpa kalpa ari eka eka narakā | parahim̐ je dūṣahim̐ śruti kari tarakā ||
जे बरनाधम तेलि कुम्हारा । स्वपच किरात कोल कलवारा ॥
नारि मुई गृह सम्पति नासी । मूड़ मुड़ाइ होहिं सन्यासी ॥
je baranādhama teli kumhārā | svapaca kirāta kola kalavārā ||
nāri muī gṛha sampati nāsī | mūr̤a mur̤āi hohiṃ sanyāsī ||
ते बिप्रन्ह सन पाँच पुजावहिँ । उभय लोक निज हाथ नसावहिँ ॥
बिप्र निरच्छर लोलुप कामी । निराचार सठ बृषली स्वामी ॥
te bipranha sana pām̐ca pujāvahim̐ | ubhaya loka nija hātha nasāvahim̐ ||
bipra niracchara lolupa kāmī | nirācāra saṭha bṛṣalī svāmī ||
सूद्र कहिँ जप तप व्रत नाना । बैठि बरासन कहहिँ पुराना ॥
सब नर कल्पित करहिँ अचारा । जाइ न बरनि अनीति अपारा ॥
sūdra kahim̐ japa tapa vrata nānā | baiṭhi barāsana kahahim̐ purānā ||
saba nara kalpita karahim̐ acārā | jāi na barani anīti apārā ||
भये बरन सङ्कर कलि, भिन्नसेतु सब लोग ।
करहिं पाप पावहिँ दुख, भय रुज सोक बियोग ॥
bhaye barana saṅkara kali, bhinnasetu saba loga |
karahiṃ pāpa pāvahim̐ dukha, bhaya ruja soka biyoga ||
श्रुति संमत हरि भक्ति-पथ, संजुत बिरति बिबेक ।
तेहि न चलहिँ नर मोह बस, कल्पहिँ पन्थ अनेक ॥
śruti saṃmata hari bhakti-patha, saṃjuta birati bibeka |
tehi na calahim̐ nara moha basa, kalpahim̐ pantha aneka ||
पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0