उत्तरकाण्ड

अध्याय 100: कलि में वर्णसंकर और छूटा मार्ग

7 श्लोक · 100 में से 130

इस अध्याय में क्या होता है

कलि में वर्णसंकर और छूटा मार्ग

काकभुशुण्डि गरुड़ को उस युग की और बातें बताते हैं। लम्पट, कपटी, द्रोह में लिपटे लोग स्वयं को अभेदवादी ज्ञानी कहते; स्वयं डूबते और सन्मार्ग वालों को भी गिराते, और तर्क से श्रुति को दूषित करने वाले कल्प-कल्प नरक में पड़ते हैं। पत्नी मरने और घर उजड़ने पर नीच जाति के लोग सिर मुँड़ाकर संन्यासी बनते और ब्राह्मणों से पाँव पुजवाते। ब्राह्मण निरक्षर और लोभी हो गए; शूद्र ऊँचे आसन पर बैठ पुराण कहने लगे। सब मनमाना आचार करते। वर्णसंकर हुआ और हर मर्यादा टूटी। श्रुतिसम्मत, वैराग्य-युक्त हरिभक्ति के पथ पर कोई नहीं चलता, सब नये पन्थ गढ़ते हैं।

100.1

पर त्रिय लम्पट कपट सयाने । मोह द्रोह ममता लपटाने ॥
तेइ अभेद-वादी ज्ञानी नर । देखा मैं चरित्र कलिजुग कर ॥

para triya lampaṭa kapaṭa sayāne | moha droha mamatā lapaṭāne ||
tei abheda-vādī jñānī nara | dekhā maiṃ caritra kalijuga kara ||

100.2

आपु गये अरु तिन्हहूँ घालहिँ । जे कहुँ सत-मारग प्रतिपालहिँ ॥
कल्प कल्प अरि एक एक नरका । परहिँ जे दूषहिँ श्रुति करि तरका ॥

āpu gaye aru tinhahūm̐ ghālahim̐ | je kahum̐ sata-māraga pratipālahim̐ ||
kalpa kalpa ari eka eka narakā | parahim̐ je dūṣahim̐ śruti kari tarakā ||

100.3

जे बरनाधम तेलि कुम्हारा । स्वपच किरात कोल कलवारा ॥
नारि मुई गृह सम्पति नासी । मूड़ मुड़ाइ होहिं सन्यासी ॥

je baranādhama teli kumhārā | svapaca kirāta kola kalavārā ||
nāri muī gṛha sampati nāsī | mūr̤a mur̤āi hohiṃ sanyāsī ||

100.4

ते बिप्रन्ह सन पाँच पुजावहिँ । उभय लोक निज हाथ नसावहिँ ॥
बिप्र निरच्छर लोलुप कामी । निराचार सठ बृषली स्वामी ॥

te bipranha sana pām̐ca pujāvahim̐ | ubhaya loka nija hātha nasāvahim̐ ||
bipra niracchara lolupa kāmī | nirācāra saṭha bṛṣalī svāmī ||

100.5

सूद्र कहिँ जप तप व्रत नाना । बैठि बरासन कहहिँ पुराना ॥
सब नर कल्पित करहिँ अचारा । जाइ न बरनि अनीति अपारा ॥

sūdra kahim̐ japa tapa vrata nānā | baiṭhi barāsana kahahim̐ purānā ||
saba nara kalpita karahim̐ acārā | jāi na barani anīti apārā ||

दो॰ 100 (क)दोहा

भये बरन सङ्कर कलि, भिन्नसेतु सब लोग ।
करहिं पाप पावहिँ दुख, भय रुज सोक बियोग ॥

bhaye barana saṅkara kali, bhinnasetu saba loga |
karahiṃ pāpa pāvahim̐ dukha, bhaya ruja soka biyoga ||

दो॰ 100 (ख)दोहा

श्रुति संमत हरि भक्ति-पथ, संजुत बिरति बिबेक ।
तेहि न चलहिँ नर मोह बस, कल्पहिँ पन्थ अनेक ॥

śruti saṃmata hari bhakti-patha, saṃjuta birati bibeka |
tehi na calahim̐ nara moha basa, kalpahim̐ pantha aneka ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0