विभीषण कहते हैं, पवनपुत्र, मैं यहाँ ऐसे रहता हूँ जैसे दाँतों के बीच जीभ। क्या भानुकुल के नाथ कभी मुझे अनाथ जानकर कृपा करेंगे? मेरा शरीर तामसी है, कोई साधन नहीं, प्रभु के चरणों में प्रीति भी नहीं। पर अब भरोसा हुआ है, क्योंकि हरि की कृपा के बिना सन्त नहीं मिलते। रघुवीर ने अनुग्रह किया है, तभी तुमने आकर मुझे दर्शन दिए। हनुमान कहते हैं, प्रभु की रीति है कि वे सदा सेवक पर प्रेम करते हैं। मैं कौन बड़े कुल का हूँ? चंचल वानर हूँ, सब प्रकार से हीन। जो सवेरे मेरा नाम ले ले, उसे उस दिन भोजन नहीं मिलता। सखा, ऐसे अधम पर भी रघुवीर ने कृपा की है। प्रभु के गुण स्मरण करते हुए हनुमान की आँखें भर आती हैं।