जानतहूँ अस स्वामि बिसारी । फिरहिँ ते काहे न होहिँ दुखारी ॥
एहि बिधि कहत राम-गुन-ग्रामा । पावा अनिर्वाच्य बिस्रामा ॥
jānatahūm̐ asa svāmi bisārī | phirahim̐ te kāhe na hohim̐ dukhārī ||
ehi bidhi kahata rāma-guna-grāmā | pāvā anirvācya bisrāmā ||
5 श्लोक · 8 में से 60
हनुमान कहते हैं, ऐसे स्वामी को जानकर भी जो उन्हें भुला देते हैं, वे दुखी क्यों न हों? राम के गुण कहते कहते दोनों को अकथनीय विश्राम मिलता है। फिर विभीषण बताते हैं कि जनकसुता वहाँ किस प्रकार रहती हैं। हनुमान कहते हैं, भाई, मैं जानकी माता के दर्शन करना चाहता हूँ। विभीषण सारी युक्ति बताते हैं और पवनपुत्र विदा लेते हैं। वे अशोक वन पहुँचते हैं। सीता को देखकर वे मन ही मन प्रणाम करते हैं और बैठे बैठे रात का एक पहर बीत जाता है। उनका शरीर दुबला है, सिर पर जटा की एक वेणी है, हृदय में रघुपति के गुणों का जप है। आँखें अपने चरणों पर हैं और मन श्रीराम के चरणों में लीन। यह दशा देखकर पवनपुत्र बहुत दुखी होते हैं।
जानतहूँ अस स्वामि बिसारी । फिरहिँ ते काहे न होहिँ दुखारी ॥
एहि बिधि कहत राम-गुन-ग्रामा । पावा अनिर्वाच्य बिस्रामा ॥
jānatahūm̐ asa svāmi bisārī | phirahim̐ te kāhe na hohim̐ dukhārī ||
ehi bidhi kahata rāma-guna-grāmā | pāvā anirvācya bisrāmā ||
पुनि सब कथा बिभीषन कही । जेहि बिधि जनक-सुता तहँ रही ॥
तब हनुमन्त कहा सुनु भ्राता । देखा चहउँ जानकी माता ॥
puni saba kathā bibhīṣana kahī | jehi bidhi janaka-sutā taham̐ rahī ||
taba hanumanta kahā sunu bhrātā | dekhā cahaum̐ jānakī mātā ||
जुगुति बिभीषन सकल सुनाई । चलेउ पवन-सुत बिदा कराई ॥
करि सोइ रूप गयउ पुनि तहवाँ । बन असोक सीता रह जहवाँ ॥
juguti bibhīṣana sakala sunāī | caleu pavana-suta bidā karāī ||
kari soi rūpa gayau puni tahavām̐ | bana asoka sītā raha jahavām̐ ||
देखि मनहिँ महँ कीन्ह प्रनामा । बैठेहिं बीति जात निसि जामा ॥
कृस तनु सीस जटा एक बेनी । जपति हृदयँ रघुपति गुन श्रेणी ॥
dekhi manahim̐ maham̐ kīnha pranāmā | baiṭhehiṃ bīti jāta nisi jāmā ||
kṛsa tanu sīsa jaṭā eka benī | japati hṛdayam̐ raghupati guna śreṇī ||
निज पद नयन दिये मन, राम-चरन महँ लीन ।
परम दुखी भा पवन-सुत, देखि जानकी दीन ॥
nija pada nayana diye mana, rāma-carana maham̐ līna |
parama dukhī bhā pavana-suta, dekhi jānakī dīna ||
पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0