सुनु लङ्केस सकल गुन तोरें । तातें तुम्ह अतिसय प्रिय मोरें ॥
राम बचन सुनि बानर-जूथा । सकल कहहिं जय कृपा-बरूथा ॥
sunu laṅkesa sakala guna toreṃ | tāteṃ tumha atisaya priya moreṃ ||
rāma bacana suni bānara-jūthā | sakala kahahiṃ jaya kṛpā-barūthā ||
7 श्लोक · 49 में से 60
श्रीराम कहते हैं, लंकेश, तुममें ये सब गुण हैं, इसलिए तुम मुझे अत्यन्त प्रिय हो। प्रभु की अमृत वाणी से विभीषण अघाते नहीं, बार बार चरण पकड़ते हैं। वे कहते हैं, चराचर के स्वामी, मन में पहले कुछ वासना थी, वह प्रभु के चरणों की प्रीति की नदी में बह गई। अब शिवजी के मन को भाने वाली अपनी पावन भक्ति दीजिए। एवमस्तु कहकर प्रभु तुरन्त समुद्र का जल मँगाते हैं। सखा, तुम्हारी इच्छा नहीं, फिर भी जगत में मेरा दर्शन अमोघ है। यह कहकर वे उनका तिलक करते हैं और आकाश से फूल बरसते हैं। रावण के क्रोध की आग से बचाकर प्रभु ने उन्हें अखण्ड राज्य दिया। जो सम्पत्ति शिव ने रावण को दस सिर चढ़ाने पर दी, वही रघुनाथ ने सकुचाते हुए विभीषण को दी।
सुनु लङ्केस सकल गुन तोरें । तातें तुम्ह अतिसय प्रिय मोरें ॥
राम बचन सुनि बानर-जूथा । सकल कहहिं जय कृपा-बरूथा ॥
sunu laṅkesa sakala guna toreṃ | tāteṃ tumha atisaya priya moreṃ ||
rāma bacana suni bānara-jūthā | sakala kahahiṃ jaya kṛpā-barūthā ||
सुनत बिभीषनु प्रभु कै बानी । नहिँ अघात श्रवनामृत जानी ॥
पद अम्बुज गहि बारहिं बारा । हृदयँ समात न प्रेमु अपारा ॥
sunata bibhīṣanu prabhu kai bānī | nahim̐ aghāta śravanāmṛta jānī ||
pada ambuja gahi bārahiṃ bārā | hṛdayam̐ samāta na premu apārā ||
सुनहु देव सचराचर स्वामी । प्रनतपाल उर अन्तरजामी ॥
उर कछु प्रथम बासना रही । प्रभु-पद-प्रीति-सरित सो बही ॥
sunahu deva sacarācara svāmī | pranatapāla ura antarajāmī ||
ura kachu prathama bāsanā rahī | prabhu-pada-prīti-sarita so bahī ||
अब कृपाल निज भगति पावनी । देहु सदा सिव मन भावनी ॥
एवमस्तु कहि प्रभु रनधीरा । मागा तुरत सिन्धु कर नीरा ॥
aba kṛpāla nija bhagati pāvanī | dehu sadā siva mana bhāvanī ||
evamastu kahi prabhu ranadhīrā | māgā turata sindhu kara nīrā ||
जदपि सखा तव इच्छा नाहीँ । मोर दरस अमोघ जग माहीँ ॥
अस कहि राम तिलक तेहि सारा । सुमन बृष्टि नभ भई अपारा ॥
jadapi sakhā tava icchā nāhīm̐ | mora darasa amogha jaga māhīm̐ ||
asa kahi rāma tilaka tehi sārā | sumana bṛṣṭi nabha bhaī apārā ||
रावन क्रोध अनल निज, स्वास समीर प्रचंड ।
जरत बिभीषन राखेउ, दीन्हेहु राज अखंड ॥
rāvana krodha anala nija, svāsa samīra pracaṃḍa |
jarata bibhīṣana rākheu, dīnhehu rāja akhaṃḍa ||
जो सम्पति सिव रावनहिँ, दीन्हि दिये दस माथ ।
सोइ सम्पदा विभीषनहिँ, सकुचि दीन्हि रघुनाथ ॥
jo sampati siva rāvanahim̐, dīnhi diye dasa mātha |
soi sampadā vibhīṣanahim̐, sakuci dīnhi raghunātha ||
पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0