सुन्दरकाण्ड

अध्याय 45: विभीषण के राम दर्शन और शरण

5 श्लोक · 45 में से 60

इस अध्याय में क्या होता है

विभीषण के राम दर्शन और शरण

वानर आदर से विभीषण को रघुपति के पास ले चलते हैं। दूर से ही वे आँखों को आनन्द देने वाले दोनों भाइयों को देखते हैं, फिर श्रीराम को देखकर एकटक ठिठक जाते हैं: लम्बी भुजाएँ, कमल जैसे नेत्र, शरणागत का भय मिटाने वाला श्याम शरीर, सिंह जैसे कन्धे, चौड़ी छाती, असंख्य कामदेवों को मोहने वाला मुख। आँखों में जल, शरीर पुलकित, धीरज धरकर वे कोमल वचन कहते हैं। नाथ, मैं रावण का भाई हूँ, राक्षस वंश में जन्मा, तामसी शरीर वाला, जिसे पाप वैसे प्रिय है जैसे उल्लू को अंधेरा। संसार का भय मिटाने वाले प्रभु, आपका सुयश सुनकर आया हूँ। हे दुख हरने वाले रघुवीर, मेरी रक्षा कीजिए, रक्षा कीजिए।

45.1

सादर तेहि आगें करि बानर । चले जहाँ रघुपति करुनाकर ॥
दूरिहि हैं देखेउ दोउ भ्राता । नयनानन्द दान के दाता ॥

sādara tehi āgeṃ kari bānara | cale jahām̐ raghupati karunākara ||
dūrihi haiṃ dekheu dou bhrātā | nayanānanda dāna ke dātā ||

45.2

बहुरि राम छवि-धाम बिलोकी । रहेउ ठटुकि एकटक पल रोकी ॥
भुज प्रलम्ब कंजारुन लोचन । स्यामल गात प्रनत भय मोचन ॥

bahuri rāma chavi-dhāma bilokī | raheu ṭhaṭuki ekaṭaka pala rokī ||
bhuja pralamba kaṃjāruna locana | syāmala gāta pranata bhaya mocana ||

45.3

सिद्ध कन्ध आयत उर सोहा । आनन अमित मदन मन मोहा ॥
नयन नीर पुलकित अति गाता । मन धरि धीर कही मृदु बाता ॥

siddha kandha āyata ura sohā | ānana amita madana mana mohā ||
nayana nīra pulakita ati gātā | mana dhari dhīra kahī mṛdu bātā ||

45.4

नाथ दसानन कर मैं भ्राता । निसिचर बंस जनम सुरत्राता ॥
सहज पापप्रिय तामस देहा । जथा उलूकहि तम पर नेहा ॥

nātha dasānana kara maiṃ bhrātā | nisicara baṃsa janama suratrātā ||
sahaja pāpapriya tāmasa dehā | jathā ulūkahi tama para nehā ||

दो॰ 45दोहा

स्रवन सुजस सुनि आयउँ, प्रभु भंजन भव भीर ।
त्राहि त्राहि आरति हरन, सरन सुखद रघुबीर ॥

sravana sujasa suni āyaum̐, prabhu bhaṃjana bhava bhīra |
trāhi trāhi ārati harana, sarana sukhada raghubīra ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0