सुन्दरकाण्ड

अध्याय 35: सेना का समुद्र तट की ओर प्रस्थान

8 श्लोक · 35 में से 60

इस अध्याय में क्या होता है

सेना का समुद्र तट की ओर प्रस्थान

भालू और वानर प्रभु के चरणों में सिर नवाकर गरजते हैं। श्रीराम कृपा भरे कमल नयनों से सेना को देखते हैं और उनकी कृपा से वानरराज पंखवाले पर्वत जैसे हो जाते हैं। शुभ शकुनों के बीच वे प्रस्थान करते हैं। सीता का बायाँ अंग फड़ककर बताता है कि प्रभु चल पड़े, और जो शकुन जानकी को शुभ हैं वही रावण को अशुभ। नख, पर्वत और वृक्ष लिए सेना आकाश और धरती पर चलती है। दो छन्द कहते हैं, दिग्गज चिंघाड़ते हैं, पर्वत डोलते हैं, समुद्र खलबलाते हैं, देवता और मुनि हर्षित हैं। भार से व्याकुल शेषनाग कच्छप की पीठ दाँतों से पकड़ते हैं, मानो उस पर यह यात्रा लिख रहे हों। प्रभु समुद्र तट पर उतरते हैं और वीर फल खाने लगते हैं।

35.1

प्रभु पद-पङ्कज नावहिं सीसा । गरजहिं भालु महाबल कीसा ॥
देखी राम सकल कपि सेना । चितइ कृपा करि राजिव-नैना ॥

prabhu pada-paṅkaja nāvahiṃ sīsā | garajahiṃ bhālu mahābala kīsā ||
dekhī rāma sakala kapi senā | citai kṛpā kari rājiva-nainā ||

35.2

राम कृपा बल पाइ कपिन्दा । भये पच्छजुत मनहुँ गिरिन्दा ॥
हरषि राम तब कीन्ह पयाना । सगुन भये सुन्दर सुभ नाना ॥

rāma kṛpā bala pāi kapindā | bhaye pacchajuta manahum̐ girindā ||
haraṣi rāma taba kīnha payānā | saguna bhaye sundara subha nānā ||

35.3

जासु सकल मङ्गल-मय कीती । तासु पयान सगुन यह नीती ॥
प्रभु पयान जाना बैदेहीं । फरकि बाम अँग जनु कहि देहीं ॥

jāsu sakala maṅgala-maya kītī | tāsu payāna saguna yaha nītī ||
prabhu payāna jānā baidehīṃ | pharaki bāma am̐ga janu kahi dehīṃ ||

35.4

जोइ जोइ सगुन जानकिहि होई । असगुन भयउ रावनहिँ सोई ॥
चला कटक को बरनइ पारा । गर्जहिँ बानर भालु अपारा ॥

joi joi saguna jānakihi hoī | asaguna bhayau rāvanahim̐ soī ||
calā kaṭaka ko baranai pārā | garjahim̐ bānara bhālu apārā ||

35.5

नख आयुध गिरि पादप धारी । चले गगन महि इच्छाचारी ॥
केहरिनाद भालु कपि करहीं । डगमगाहिं दिग्गज चिक्करहीं ॥

nakha āyudha giri pādapa dhārī | cale gagana mahi icchācārī ||
keharināda bhālu kapi karahīṃ | ḍagamagāhiṃ diggaja cikkarahīṃ ||

35.छं॰ 1छन्द

चिक्करहिँ दिग्गज डोल महि गिरि, लोल सागर खरभरे ।
मन हरष दिनकर सोम सुर मुनि, नाग किन्नर दुख टरे ॥
कटकटहिँ मर्कट बिकट भट बहु, कोटि कोटिन्ह धावहीं ।
जय राम प्रबल प्रताप कोसल, नाथ गुन गन गावहीं ॥

cikkarahim̐ diggaja ḍola mahi giri, lola sāgara kharabhare |
mana haraṣa dinakara soma sura muni, nāga kinnara dukha ṭare ||
kaṭakaṭahim̐ markaṭa bikaṭa bhaṭa bahu, koṭi koṭinha dhāvahīṃ |
jaya rāma prabala pratāpa kosala, nātha guna gana gāvahīṃ ||

35.छं॰ 2छन्द

सहि सक न बार उदार अहिपति बार बारहिँ मोहई ।
गह दसन पुनि पुनि कमठ-पृष्ट, कठोर सो किमि सोहई ॥
रघुबीर रुचिर प्रयान प्रस्थिति, जानि परम सुहावनी ।
जनु कमठ-खर्पर सर्पराज सो, लिखत अबिचल पावनी ॥

sahi saka na bāra udāra ahipati bāra bārahim̐ mohaī |
gaha dasana puni puni kamaṭha-pṛṣṭa, kaṭhora so kimi sohaī ||
raghubīra rucira prayāna prasthiti, jāni parama suhāvanī |
janu kamaṭha-kharpara sarparāja so, likhata abicala pāvanī ||

दो॰ 35दोहा

एहि बिधि जाइ कृपानिधि, उतरे सागर तीर ।
जहँ तहँ लागे खान फल, भालु बिपुल कपि बीर ॥

ehi bidhi jāi kṛpānidhi, utare sāgara tīra |
jaham̐ taham̐ lāge khāna phala, bhālu bipula kapi bīra ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0