नाथ भगति अति सुखदायनी । देहु कृपा करि अनपायनी ॥
सुनि प्रभु परम सरल कपि बानी । एवमस्तु तब कहेउ भवानी ॥
nātha bhagati ati sukhadāyanī | dehu kṛpā kari anapāyanī ||
suni prabhu parama sarala kapi bānī | evamastu taba kaheu bhavānī ||
5 श्लोक · 34 में से 60
हनुमान कहते हैं, नाथ, कृपा करके मुझे परम सुख देने वाली अचल भक्ति दीजिए। कपि की अत्यन्त सरल वाणी सुनकर प्रभु कहते हैं, एवमस्तु। शिवजी कहते हैं, उमा, जिसने राम का स्वभाव जान लिया, उसे भजन छोड़कर और कुछ नहीं भाता, और जिसके हृदय में यह संवाद उतर जाए, वह रघुपति के चरणों की भक्ति पाता है। प्रभु के वचन सुनकर वानर कहते हैं, जय जय जय कृपालु सुखकन्द। तब रघुपति सुग्रीव को बुलाकर कहते हैं, चलने की तैयारी करो। अब देर किस कारण? वानरों को तुरन्त आज्ञा दो। यह लीला देखकर देवता बहुत फूल बरसाते हैं और हर्षित होकर अपने लोक लौटते हैं। कपिराज तुरन्त बुलाते हैं और यूथपति अपने दलों के साथ आते हैं, अनेक रंगों के, अतुल बलवाले भालू और वानरों के समूह।
नाथ भगति अति सुखदायनी । देहु कृपा करि अनपायनी ॥
सुनि प्रभु परम सरल कपि बानी । एवमस्तु तब कहेउ भवानी ॥
nātha bhagati ati sukhadāyanī | dehu kṛpā kari anapāyanī ||
suni prabhu parama sarala kapi bānī | evamastu taba kaheu bhavānī ||
उमा राम सुभाव जेहिं जाना । ताहि भजन तजि भाव न आना ॥
यह सम्बाद जासु उर आवा । रघुपति-चरन-भगति सोइ पावा ॥
umā rāma subhāva jehiṃ jānā | tāhi bhajana taji bhāva na ānā ||
yaha sambāda jāsu ura āvā | raghupati-carana-bhagati soi pāvā ||
सुनि प्रभु बचन कहहिँ कपि बृन्दा । जय जय जय कृपाल सुखकन्दा ॥
तब रघुपति कपिपतिहि बोलावा । कहा चलइ कर करहु बनावा ॥
suni prabhu bacana kahahim̐ kapi bṛndā | jaya jaya jaya kṛpāla sukhakandā ||
taba raghupati kapipatihi bolāvā | kahā calai kara karahu banāvā ||
अब बिलम्ब केहि कारन कीजै । तुरत कपिन्ह कह आयसु दीजै ॥
कौतुक देखि सुमन बहु बरषी । नभ तें भवन चले सुर हरषी ॥
aba bilamba kehi kārana kījai | turata kapinha kaha āyasu dījai ||
kautuka dekhi sumana bahu baraṣī | nabha teṃ bhavana cale sura haraṣī ||
कपिपति बेगि बोलाये, आये जूथप जूथ ।
नाना बरन अतुल बल, बानर भालु बरूथ ॥
kapipati begi bolāye, āye jūthapa jūtha |
nānā barana atula bala, bānara bhālu barūtha ||
पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0