प्रभु बार बार हनुमान को उठाना चाहते हैं, पर प्रेम में मग्न कपि को उठना नहीं भाता। प्रभु का करकमल कपि के सिर पर है, यह दशा याद करके गौरीश स्वयं मग्न हो जाते हैं, फिर मन सँभालकर कथा कहते हैं। प्रभु कपि को उठाकर हृदय से लगाते हैं और पास बिठाते हैं। पूछते हैं, रावण की बाँकी लंका तुमने कैसे जलाई? प्रभु को प्रसन्न जानकर हनुमान अभिमान रहित होकर कहते हैं, बन्दर का बड़ा पुरुषार्थ यही है कि डाल से डाल पर कूद जाए। मैंने समुद्र लाँघा, सोने का नगर जलाया, राक्षस मारे, वन उजाड़ा, यह सब आपका प्रताप है रघुराई, मेरी प्रभुता नहीं। जिस पर आप अनुकूल हों उसके लिए कुछ कठिन नहीं, आपके प्रभाव से रुई भी बड़वानल को जला सकती है।