सुन्दरकाण्ड

अध्याय 32: श्रीराम हनुमान के ऋणी

5 श्लोक · 32 में से 60

इस अध्याय में क्या होता है

श्रीराम हनुमान के ऋणी

सीता का दुख सुनकर प्रभु के कमल नयनों में जल भर आता है। वे कहते हैं, जिसका मन, वचन, शरीर से एकमात्र आश्रय मैं हूँ, क्या उसे सपने में भी विपत्ति हो सकती है? हनुमान कहते हैं, विपत्ति तो तभी है जब आपका स्मरण न हो, राक्षसों की क्या बात, आप शत्रु को जीतकर जानकी को लाएँगे। श्रीराम कहते हैं, कपि, तुम्हारे जैसा उपकारी कोई देवता, मनुष्य या मुनि नहीं। मैं तुम्हारा क्या प्रत्युपकार करूँ? मेरा मन तुम्हारे सामने नहीं हो पाता, पुत्र, मैंने विचार कर देख लिया, मैं तुमसे उऋण नहीं हो सकता। प्रभु की भीगी आँखें और पुलकित शरीर देखकर हनुमान प्रेम से व्याकुल होकर चरणों में गिरते हैं, त्राहि त्राहि भगवन्त।

32.1

सुनि सीता दुख प्रभु सुख अयना । भरि आये जल राजिव-नयना ॥
बचन काँय मन मम गति जाही । सपनेहुँ बूझिअ बिपति कि ताही ॥

suni sītā dukha prabhu sukha ayanā | bhari āye jala rājiva-nayanā ||
bacana kām̐ya mana mama gati jāhī | sapanehum̐ būjhia bipati ki tāhī ||

32.2

कह हनुमन्त बिपति प्रभु सोई । जब तब सुमिरन सजन न होई ॥
केतिक बात प्रभु जातुधान की । रिपुहि जीति आनिबी जानकी ॥

kaha hanumanta bipati prabhu soī | jaba taba sumirana sajana na hoī ||
ketika bāta prabhu jātudhāna kī | ripuhi jīti ānibī jānakī ||

32.3

सुनु कपि तोहि समान उपकारी । नहिं कोउ सुर नर मुनि तनु धारी ॥
प्रति उपकार करौँ का तोरा । सनमुख होइ न सकत मन मोरा ॥

sunu kapi tohi samāna upakārī | nahiṃ kou sura nara muni tanu dhārī ||
prati upakāra karaum̐ kā torā | sanamukha hoi na sakata mana morā ||

32.4

सुनु सुत उरिन मैं नाहीं । देखेउँ करि बिचार मन माहीं ॥
पुनि पुनि कपिहि चितव सुरत्राता । लोचन नीर पुलक अति गाता ॥

sunu suta urina maiṃ nāhīṃ | dekheum̐ kari bicāra mana māhīṃ ||
puni puni kapihi citava suratrātā | locana nīra pulaka ati gātā ||

दो॰ 32दोहा

सुनि प्रभु बचन बिलोकि मुख, गात हरषि हनुमन्त ।
चरन परेउ प्रेमाकुल, त्राहि त्राहि भगवन्त ॥

suni prabhu bacana biloki mukha, gāta haraṣi hanumanta |
carana pareu premākula, trāhi trāhi bhagavanta ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0