सुन्दरकाण्ड

अध्याय 31: सीता का सन्देश श्रीराम तक

6 श्लोक · 31 में से 60

इस अध्याय में क्या होता है

सीता का सन्देश श्रीराम तक

हनुमान चूड़ामणि देते हैं और रघुपति उसे हृदय से लगा लेते हैं। कपि बताते हैं, आँसू भरी आँखों से जनककुमारी ने कहा: हे दीनबन्धु, मन, वचन, कर्म से मेरा आपके चरणों में अनुराग है, फिर किस अपराध से आपने मुझे त्यागा? मेरा एक अवगुण मैं जानती हूँ, बिछुड़ते ही प्राण नहीं गए। यह आँखों का अपराध है, जो प्राणों को हठ से रोकती हैं। विरह आग है, देह रुई और साँस हवा, क्षण में जल जाए, पर आँखें जल बहाती हैं, इसलिए देह नहीं जलती। कपि कहते हैं, उनकी विपत्ति न कहना ही भला, उनका हर पल कल्प सा बीतता है। प्रभु, जल्दी चलिए और भुजबल से दुष्टों को जीतकर उन्हें ले आइए।

31.1

चलत मोहि चूडामनि दीन्ही । रघुपति हृदयँ लाइ सोइ लीन्ही ॥
नाथ जुगल लोचन भरि बारी । बचन कहे कछु जनक-कुमारी ॥

calata mohi cūḍāmani dīnhī | raghupati hṛdayam̐ lāi soi līnhī ||
nātha jugala locana bhari bārī | bacana kahe kachu janaka-kumārī ||

31.2

अनुज समेत गहेहु प्रभु चरना । दीन बन्धु प्रनतारति हरना ॥
मन क्रम बचन चरन अनुरागा । केहि अपराध नाथ हैँ त्यागी ॥

anuja sameta gahehu prabhu caranā | dīna bandhu pranatārati haranā ||
mana krama bacana carana anurāgā | kehi aparādha nātha haim̐ tyāgī ||

31.3

अवगुन एक मोर मैं जाना । बिछुरत प्रान न कीन्ह पयाना ॥
नाथ सो नयनन्हि कर अपराधा । निसरत प्रान करहिं हठि बाधा ॥

avaguna eka mora maiṃ jānā | bichurata prāna na kīnha payānā ||
nātha so nayananhi kara aparādhā | nisarata prāna karahiṃ haṭhi bādhā ||

31.4

बिरह अगिनि तनु तूल समीरा । स्वास जरइ छन माहिँ सरीरा ॥
नयन स्त्रवहि जल निज हित लागी । जरइ न पाव देह बिरहागि ॥

biraha agini tanu tūla samīrā | svāsa jarai chana māhim̐ sarīrā ||
nayana stravahi jala nija hita lāgī | jarai na pāva deha birahāgi ||

31.5

सीता कै अति बिपति बिसाला । बिनहिँ कहें भलि दीनदयाला ॥

sītā kai ati bipati bisālā | binahim̐ kaheṃ bhali dīnadayālā ||

दो॰ 31दोहा

निमिष निमिष करुनानिधि, जाहिँ कलप सम बीति ।
बेगि चलिय प्रभु आनिय, भुज बल खल दल जीति ॥

nimiṣa nimiṣa karunānidhi, jāhim̐ kalapa sama bīti |
begi caliya prabhu āniya, bhuja bala khala dala jīti ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0