जामवन्त कह सुनु रघुराया । जा पर नाथ करहु तुम्ह दाया ॥
ताहि सदा सुभ कुसल निरन्तर । सुर नर मुनि प्रसन्न ता ऊपर ॥
jāmavanta kaha sunu raghurāyā | jā para nātha karahu tumha dāyā ||
tāhi sadā subha kusala nirantara | sura nara muni prasanna tā ūpara ||
5 श्लोक · 30 में से 60
जाम्बवान कहते हैं, रघुराई, जिस पर आप दया करते हैं उसका सदा कुशल होता है, देवता, मनुष्य और मुनि उस पर प्रसन्न रहते हैं और उसका यश तीनों लोकों में फैलता है। आपकी कृपा से सब काम हुआ, आज हमारा जन्म सफल हुआ। नाथ, पवनपुत्र की करनी हज़ार मुखों से भी नहीं कही जा सकती। फिर वे हनुमान के चरित्र सुनाते हैं। प्रसन्न होकर कृपानिधि हनुमान को हृदय से लगाते हैं और पूछते हैं, तात, जानकी कैसे रहती हैं, अपने प्राण कैसे बचाती हैं? हनुमान दोहे में कहते हैं: आपका नाम दिन रात पहरा देता है, आपका ध्यान किवाड़ है, आँखें अपने चरणों पर जमी हैं, फिर प्राण किस राह से जाएँ?
जामवन्त कह सुनु रघुराया । जा पर नाथ करहु तुम्ह दाया ॥
ताहि सदा सुभ कुसल निरन्तर । सुर नर मुनि प्रसन्न ता ऊपर ॥
jāmavanta kaha sunu raghurāyā | jā para nātha karahu tumha dāyā ||
tāhi sadā subha kusala nirantara | sura nara muni prasanna tā ūpara ||
सोइ बिजई बिनई गुन-सागर । तासु सुजस त्रय लोक उजागर ॥
प्रभु कीं कृपा भयउ सब काजू । जनम हमार सुफल भा आजू ॥
soi bijaī binaī guna-sāgara | tāsu sujasa traya loka ujāgara ||
prabhu kīṃ kṛpā bhayau saba kājū | janama hamāra suphala bhā ājū ||
नाथ पवन-सुत कीन्हि जो करनी । सहसहुँ मुख न जाइ सो बरनी ॥
पवन-तनय के चरित सुहाये । जामवन्त रघुपतिहि सुनाये ॥
nātha pavana-suta kīnhi jo karanī | sahasahum̐ mukha na jāi so baranī ||
pavana-tanaya ke carita suhāye | jāmavanta raghupatihi sunāye ||
सुनत कृपानिधि मन अति भाये । पुनि हनुमान हरषि हियँ लाये ॥
कहहु तात केहि भाँति जानकी । रहति करति रच्छा स्व प्रान की ॥
sunata kṛpānidhi mana ati bhāye | puni hanumāna haraṣi hiyam̐ lāye ||
kahahu tāta kehi bhām̐ti jānakī | rahati karati racchā sva prāna kī ||
नाम पाहरु दिवस निसि, ध्यान तुम्हार कपाट ।
लोचन निज पद जन्त्रित, जाहिँ प्रान केहिं बाट ॥
nāma pāharu divasa nisi, dhyāna tumhāra kapāṭa |
locana nija pada jantrita, jāhim̐ prāna kehiṃ bāṭa ||
पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0