त्रिजटा नाम राच्छसी एका । राम चरन रति निपुन बिबेका ॥
सबन्हौँ बोलि सुनायेसि सपना । सीतहि सेइ करहु हित अपना ॥
trijaṭā nāma rācchasī ekā | rāma carana rati nipuna bibekā ||
sabanhaum̐ boli sunāyesi sapanā | sītahi sei karahu hita apanā ||
5 श्लोक · 11 में से 60
श्रीराम के चरणों में प्रीति रखने वाली, विवेक में निपुण राक्षसी त्रिजटा सबको बुलाकर अपना सपना सुनाती है और कहती है कि सीता की सेवा करके अपना भला करो। सपने में एक वानर ने लंका जलाई और राक्षस सेना मार डाली। रावण नंगा, सिर मुँड़ाए, बीसों भुजाएँ कटी हुई, गधे पर चढ़कर दक्षिण को गया। लंका विभीषण को मिली, नगर में रघुवीर की दुहाई फिरी और प्रभु ने सीता को बुलवाया। मैं पुकारकर कहती हूँ, चार दिन में यह सपना सच होगा। सुनकर राक्षसियाँ डरकर जनकसुता के चरणों में गिरती हैं, फिर बिखर जाती हैं। सीता सोचती हैं, महीना बीतते ही नीच राक्षस मुझे मार डालेगा।
त्रिजटा नाम राच्छसी एका । राम चरन रति निपुन बिबेका ॥
सबन्हौँ बोलि सुनायेसि सपना । सीतहि सेइ करहु हित अपना ॥
trijaṭā nāma rācchasī ekā | rāma carana rati nipuna bibekā ||
sabanhaum̐ boli sunāyesi sapanā | sītahi sei karahu hita apanā ||
सपनें बानर लङ्का जारी । जातुधान सेना सब मारी ॥
खर आरूढ़ नगन दससीसा । मुंडित सिर खंडित भुज बीसा ॥
sapaneṃ bānara laṅkā jārī | jātudhāna senā saba mārī ||
khara ārūr̤ha nagana dasasīsā | muṃḍita sira khaṃḍita bhuja bīsā ||
एहि बिधि सो दच्छिन दिसि जाई । लङ्का मनहुँ बिभीषन पाई ॥
नगर फिरी रघुबीर दोहाई । तब प्रभु सीता बोलि पठाई ॥
ehi bidhi so dacchina disi jāī | laṅkā manahum̐ bibhīṣana pāī ||
nagara phirī raghubīra dohāī | taba prabhu sītā boli paṭhāī ||
यह सपना मैं कहउँ पुकारी । होइहि सत्य गये दिन चारी ॥
तासु बचन सुनि ते सब डरीँ । जनक-सुता के चरनन्हि परीं ॥
yaha sapanā maiṃ kahaum̐ pukārī | hoihi satya gaye dina cārī ||
tāsu bacana suni te saba ḍarīm̐ | janaka-sutā ke carananhi parīṃ ||
जहँ तहँ गईं सकल मिलि, सीता कर मन सोच ।
मास दिवस बीतें मोहि, मारिहि निसिचर पोच ॥
jaham̐ taham̐ gaīṃ sakala mili, sītā kara mana soca |
māsa divasa bīteṃ mohi, mārihi nisicara poca ||
पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0