त्रिजटा सन बाली करजोरी । मातु बिपति सङ्गिनि तैँ मोरी ॥
तजउँ देह करु बेगि उपाई । दुसह बिरह अब नहिँ सहि जाई ॥
trijaṭā sana bālī karajorī | mātu bipati saṅgini taim̐ morī ||
tajaum̐ deha karu begi upāī | dusaha biraha aba nahim̐ sahi jāī ||
7 श्लोक · 12 में से 60
सीता त्रिजटा से कहती हैं, माता, तुम विपत्ति की संगिनी हो, चिता बनाकर आग लगा दो, यह विरह अब नहीं सहा जाता। त्रिजटा चरण पकड़कर प्रभु का प्रताप सुनाती है, कहती है कि रात में आग नहीं मिलेगी, और चली जाती है। सीता कहती हैं, विधाता उल्टा है, आकाश अंगारों से भरा है पर एक तारा भी नहीं गिरता, चन्द्रमा आग का है पर आग नहीं बरसाता। वे अशोक से विनती करती हैं कि अपना नाम सच कर, मेरा शोक हर, तेरे नये पत्ते आग जैसे हैं। हनुमान को वह क्षण कल्प सा लगता है। वे मुद्रिका डाल देते हैं। सीता उसे अशोक का दिया अंगारा समझकर हर्ष से उठा लेती हैं।
त्रिजटा सन बाली करजोरी । मातु बिपति सङ्गिनि तैँ मोरी ॥
तजउँ देह करु बेगि उपाई । दुसह बिरह अब नहिँ सहि जाई ॥
trijaṭā sana bālī karajorī | mātu bipati saṅgini taim̐ morī ||
tajaum̐ deha karu begi upāī | dusaha biraha aba nahim̐ sahi jāī ||
आनि काठ रचु चिता बनाई । मातु अनल पुनि देहि लगाई ॥
सत्य करहि मम प्रीति सयानी । सुनइ को स्रवन सूल सम बानी ॥
āni kāṭha racu citā banāī | mātu anala puni dehi lagāī ||
satya karahi mama prīti sayānī | sunai ko sravana sūla sama bānī ||
सुनत बचन पद गहि समुझाएसि । प्रभु प्रताप-बल-सुजस सुनायेसि ॥
निसि न अनल मिलु सुनु सुकुमारी । अस कहि सो निज भवन सिधारी ॥
sunata bacana pada gahi samujhāesi | prabhu pratāpa-bala-sujasa sunāyesi ||
nisi na anala milu sunu sukumārī | asa kahi so nija bhavana sidhārī ||
कह सीता बिधि भा प्रतिकूला । मिलिहि न पावक मिटिहि न सूला ॥
देखिअत प्रगट गगन अङ्गारा । अवनि न आवत एकउ तारा ॥
kaha sītā bidhi bhā pratikūlā | milihi na pāvaka miṭihi na sūlā ||
dekhiata pragaṭa gagana aṅgārā | avani na āvata ekau tārā ||
पावकमय ससि स्रवत न आगी । मानहुँ मोहि जानि हतभागी ॥
सुनहि बिनय मम बिटप असोका । सत्य नाम करु हरु मम सोका ॥
pāvakamaya sasi sravata na āgī | mānahum̐ mohi jāni hatabhāgī ||
sunahi binaya mama biṭapa asokā | satya nāma karu haru mama sokā ||
नूतन किसलय अनल समाना । देहि अगिनि तन करहि निदाना ॥
देखि परम बिरहाकुल सीता । सो छन कपिहि कलप सम बीता ॥
nūtana kisalaya anala samānā | dehi agini tana karahi nidānā ||
dekhi parama birahākula sītā | so chana kapihi kalapa sama bītā ||
कपि करि हृदयँ बिचार, दीन्हि मुद्रिका डारि तब ।
जनु असोक अङ्गार, दीन्ह हरषि उठि कर गहेउ ॥
kapi kari hṛdayam̐ bicāra, dīnhi mudrikā ḍāri taba |
janu asoka aṅgāra, dīnha haraṣi uṭhi kara gaheu ||
पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0