लंकाकाण्ड

अध्याय 95: आकाश में हनुमान और रावण का युद्ध

6 श्लोक · 95 में से 121

इस अध्याय में क्या होता है

आकाश में हनुमान और रावण का युद्ध

विभीषण को बहुत थका देख हनुमान पर्वत लेकर दौड़ते हैं। वे रावण के रथ, घोड़े और सारथी को नष्ट करके उसकी छाती पर लात मारते हैं। रावण काँपता हुआ खड़ा रहता है और विभीषण जनरक्षक प्रभु के पास लौट जाते हैं। फिर रावण ललकारकर हनुमान को मारता है, और हनुमान पूँछ फैलाकर आकाश में उड़ जाते हैं। रावण पूँछ पकड़कर उनके साथ उड़ता है, और दोनों आकाश में लड़ते हैं, मानो काजल का पर्वत सुमेरु से लड़ रहा हो। जब बुद्धि और बल से भी निशाचर नहीं गिरता, तो पवनपुत्र प्रभु का स्मरण करते हैं। वह गिरकर फिर उठता और लड़ता है, देवता दोनों की जय बोलते हैं। रघुवीर की ललकार पर वानर फिर दौड़ते हैं, और उनका बल देखकर रावण माया प्रकट करता है।

95.1

देखा श्रमित बिभीषन भारी । धायउ हनूमान गिरि धारी ॥
रथ तुरङ्ग सारथी निपाता । हृदय माँझ तेहि मारेसि लाता ॥

dekhā śramita bibhīṣana bhārī | dhāyau hanūmāna giri dhārī ||
ratha turaṅga sārathī nipātā | hṛdaya mām̐jha tehi māresi lātā ||

95.2

ठाढ़ रहा अति-कम्पित गाता । गयउ बिभीषन जहँ जनत्राता ॥
पुनि रावन कपि हतेउ पचारी । चलेउ गगन कपि पूँछ पसारी ॥

ṭhār̤ha rahā ati-kampita gātā | gayau bibhīṣana jaham̐ janatrātā ||
puni rāvana kapi hateu pacārī | caleu gagana kapi pūm̐cha pasārī ||

95.3

गहिसि पूँछ कपि सहित उड़ाना । पुनि फिरि भिरेउ प्रबल हनुमाना ॥
लरत अकास जुगल सम जोधा । एकहि एक हनत कर क्रोधा ॥

gahisi pūm̐cha kapi sahita ur̤ānā | puni phiri bhireu prabala hanumānā ||
larata akāsa jugala sama jodhā | ekahi eka hanata kara krodhā ||

95.4

सोहहिं नभ छल बल बहु करहीँ । कज्जल गिरि सुमेरु जनु लरहीं ॥
बुधि बल निसिचर परइ न मारेउ । तब मारुत-सुत प्रभु संभार्यो ॥

sohahiṃ nabha chala bala bahu karahīm̐ | kajjala giri sumeru janu larahīṃ ||
budhi bala nisicara parai na māreu | taba māruta-suta prabhu saṃbhāryo ||

95.छं॰ 1छन्द

सम्भारि श्रीरघुबीर धीर पचारि कपि रावन हन्यो ।
महि परत पुनि उठि लरत देवन्ह, जुगल कहँ जय जय भन्यो ॥
हनुमन्त सङ्कट देखि मर्कट, भालु क्रोधातुर चढे ।
रन-मत्त रावन सकल सुभट प्रचंड भुज-बल दलमले ॥

sambhāri śrīraghubīra dhīra pacāri kapi rāvana hanyo |
mahi parata puni uṭhi larata devanha, jugala kaham̐ jaya jaya bhanyo ||
hanumanta saṅkaṭa dekhi markaṭa, bhālu krodhātura caḍhe |
rana-matta rāvana sakala subhaṭa pracaṃḍa bhuja-bala dalamale ||

दो॰ 95दोहा

तब रघुवीर पचारे, धाये कीस प्रचंड ।
कपि दल प्रबल देखि तेहिं, कीन्ह प्रगट पाखंड ॥

taba raghuvīra pacāre, dhāye kīsa pracaṃḍa |
kapi dala prabala dekhi tehiṃ, kīnha pragaṭa pākhaṃḍa ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0