आवत देखि सक्ति खर धारा । प्रनतारति भञ्जन पन मोरा ॥
तुरत बिभीषन पाछें मेला । सनमुख राम सहेउ सोइ सेला ॥
āvata dekhi sakti khara dhārā | pranatārati bhañjana pana morā ||
turata bibhīṣana pācheṃ melā | sanamukha rāma saheu soi selā ||
6 श्लोक · 94 में से 121
शक्ति आती देख प्रभु अपना प्रण स्मरण करते हैं कि शरणागत का दुख हरना है। वे तुरन्त विभीषण को पीछे करके सामने से शक्ति अपने ऊपर सह लेते हैं। शक्ति लगने से उन्हें कुछ मूर्च्छा आती है। प्रभु को कष्ट में देख विभीषण क्रोध से गदा लेकर दौड़ते हैं: अभागे, तूने देवता, मनुष्य और मुनि सबसे वैर किया। शिवजी को सिर चढ़ाकर तूने करोड़ों पाए, इसी से अब तक बचा। अब काल तेरे सिर पर नाच रहा है। कहकर वे उसकी छाती पर गदा मारते हैं। रावण गिरता है, फिर उठकर दोनों मल्लयुद्ध करते हैं। शिवजी उमा से कहते हैं: जो विभीषण कभी रावण की ओर आँख उठाकर नहीं देखते थे, वे आज श्री रघुवीर के प्रभाव से काल की तरह भिड़ रहे हैं।
आवत देखि सक्ति खर धारा । प्रनतारति भञ्जन पन मोरा ॥
तुरत बिभीषन पाछें मेला । सनमुख राम सहेउ सोइ सेला ॥
āvata dekhi sakti khara dhārā | pranatārati bhañjana pana morā ||
turata bibhīṣana pācheṃ melā | sanamukha rāma saheu soi selā ||
लागि सक्ति मुरुछा कछु भई । प्रभु कृत खेल सुरन्ह बिकलई ॥
देखि बिभीषन प्रभु श्रम पायो । गहि कर गदा क्रुद्ध होइ धायो ॥
lāgi sakti muruchā kachu bhaī | prabhu kṛta khela suranha bikalaī ||
dekhi bibhīṣana prabhu śrama pāyo | gahi kara gadā kruddha hoi dhāyo ||
रे कुभाग्य सठ मन्द कुबुद्धे । तैं सुर नर मुनि नाग बिरुद्धे ॥
सादर सिव कहुँ सीस चढ़ाए । एक एक के कोटिन्ह पाए ॥
re kubhāgya saṭha manda kubuddhe | taiṃ sura nara muni nāga biruddhe ||
sādara siva kahum̐ sīsa car̤hāe | eka eka ke koṭinha pāe ||
तेहि कारन खल अब लगि बाँच्यों । अब तव काल सीस पर नाच्यो ॥
राम-बिमुख सठ चहसि सम्पदा । अस कहि हनेसि माँझ उर गदा ॥
tehi kārana khala aba lagi bām̐cyoṃ | aba tava kāla sīsa para nācyo ||
rāma-bimukha saṭha cahasi sampadā | asa kahi hanesi mām̐jha ura gadā ||
उर माँझ गदा प्रहार घोर कठोर लागत महि पर्यो ।
दस-बदन-सोनित-स्त्रवत पुनि सम्भारि धायो रिस भर्यो ॥
द्वौ भिरे अतिबल मल्लजुद्ध बिरुद्ध एक एकहि हनै ।
रघुबीर बल दर्पित बिभीषनु, घालि नहिँ ता कहँ गनै ॥
ura mām̐jha gadā prahāra ghora kaṭhora lāgata mahi paryo |
dasa-badana-sonita-stravata puni sambhāri dhāyo risa bharyo ||
dvau bhire atibala mallajuddha biruddha eka ekahi hanai |
raghubīra bala darpita bibhīṣanu, ghāli nahim̐ tā kaham̐ ganai ||
उमा बिभीषन रावनहि, सनमुख चितव कि काउ ।
सो अब भिरत काल ज्यों, श्रीरघुबीर प्रभाउ ॥
umā bibhīṣana rāvanahi, sanamukha citava ki kāu |
so aba bhirata kāla jyoṃ, śrīraghubīra prabhāu ||
पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0