अस कहि रथ रघुनाथ चलावा । विप्र-चरन-पङ्कज सिर नाना ॥
तब लंकेस क्रोध उर छावा । गर्जत तर्जत सनमुख धावा ॥
asa kahi ratha raghunātha calāvā | vipra-carana-paṅkaja sira nānā ||
taba laṃkesa krodha ura chāvā | garjata tarjata sanamukha dhāvā ||
7 श्लोक · 90 में से 121
मन में ब्राह्मणों के चरणों को प्रणाम कर रघुनाथ रथ आगे बढ़ाते हैं। रावण गरजता-धमकाता सामने दौड़ता है: सुन तपस्वी, जिन योद्धाओं को तूने जीता, मैं उनके जैसा नहीं। लोकपाल मेरे बन्दीगृह में हैं। तूने खर, दूषण, विराध को मारा, बेचारे बालि को व्याध की तरह मारा, कुम्भकर्ण और मेघनाद को मारा। आज सारा वैर चुका लूँगा, यदि तू भाग न गया। उसे काल के वश जानकर कृपानिधान हँसकर कहते हैं: तेरी प्रभुता सच है, पर बकवास मत कर, पुरुषार्थ दिखा। संसार में पुरुष तीन प्रकार के हैं, पाटल, आम और कटहल जैसे। एक केवल कहता है, एक कहता और करता है, एक बिना कहे करता है। रावण हँसता है: मुझे ज्ञान सिखाता है? वैर करते समय नहीं डरा, अब प्राण प्यारे लगने लगे।
अस कहि रथ रघुनाथ चलावा । विप्र-चरन-पङ्कज सिर नाना ॥
तब लंकेस क्रोध उर छावा । गर्जत तर्जत सनमुख धावा ॥
asa kahi ratha raghunātha calāvā | vipra-carana-paṅkaja sira nānā ||
taba laṃkesa krodha ura chāvā | garjata tarjata sanamukha dhāvā ||
जीतेहु जे भट सञ्जुग माहीं । सुनु तापस में तिन्ह सम नाहीं ॥
रावन नाम जगत जस जाना । लोकप जाकें बन्दीखाना ॥
jītehu je bhaṭa sañjuga māhīṃ | sunu tāpasa meṃ tinha sama nāhīṃ ||
rāvana nāma jagata jasa jānā | lokapa jākeṃ bandīkhānā ||
खर-दूषन-बिराध तुम्ह मारा । बधेहु ब्याध इव बालि बिचारा ॥
निसिचर-निकर सुभट संघारेहु । कुम्भकरन घननादहि मारेहु ॥
khara-dūṣana-birādha tumha mārā | badhehu byādha iva bāli bicārā ||
nisicara-nikara subhaṭa saṃghārehu | kumbhakarana ghananādahi mārehu ||
आजु वयर सब लेउँ निबाही । जौँ रन भूप भाजि न जाई ॥
आजु करउँ खलु काल-हवाले । परेहु कठिन रावन के पाले ॥
āju vayara saba leum̐ nibāhī | jaum̐ rana bhūpa bhāji na jāī ||
āju karaum̐ khalu kāla-havāle | parehu kaṭhina rāvana ke pāle ||
सुनि दुर्बचन काल-बस जाना । बिहँसि बचन कह कृपानिधाना ॥
सत्य सत्य सब तब प्रभुताई । जल्पसि जनि देखाउ मनुसाई ॥
suni durbacana kāla-basa jānā | biham̐si bacana kaha kṛpānidhānā ||
satya satya saba taba prabhutāī | jalpasi jani dekhāu manusāī ||
जनि जल्पना करि सुजस नासहि, नीति सुनहि करहि छमा ।
संसार महँ पूरुष त्रिबिधि पाटल रसाल पनस समा ॥
एक सुमन प्रद एक-सुमन-फल एक, फलइ केवल लागहीं ।
एक कहहिं कहहिं करहिं अपर एक, करहिं कहत न बागहीं ॥
jani jalpanā kari sujasa nāsahi, nīti sunahi karahi chamā |
saṃsāra maham̐ pūruṣa tribidhi pāṭala rasāla panasa samā ||
eka sumana prada eka-sumana-phala eka, phalai kevala lāgahīṃ |
eka kahahiṃ kahahiṃ karahiṃ apara eka, karahiṃ kahata na bāgahīṃ ||
राम बचन सुनि बिहँसा, मोहि सिखावत ज्ञान ।
बयर करत नहिँ तब डरे, अब लागे प्रिय प्रात ॥
rāma bacana suni biham̐sā, mohi sikhāvata jñāna |
bayara karata nahim̐ taba ḍare, aba lāge priya prāta ||
पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0