इस अध्याय में क्या होता है श्रीराम के क्रोध से काँपते लोक कटु वचन कहकर रावण वज्र जैसे बाण छोड़ता है। रघुवीर अग्निबाण छोड़ते हैं, जिनसे वे क्षण में जल जाते हैं। वह खिसियाकर शक्ति चलाता है, प्रभु उसे बाण से लौटा देते हैं। रावण के बाण दुष्ट के मनोरथों की तरह निष्फल होते हैं। तब वह सौ बाणों से सारथी मातलि को मारता है, जो जय राम पुकारता हुआ गिरता है। प्रभु कृपा करके उसे उठाते हैं और फिर उन्हें बड़ा क्रोध आता है। तरकश में बाण कसमसाते हैं, धनुष की टंकार से राक्षस डर जाते हैं, मन्दोदरी का हृदय काँपता है, और यह कौतुक देखकर देवता हँसते हैं। प्रभु कान तक धनुष तानकर बाण छोड़ते हैं, जो लहराते सर्पों जैसे चलते हैं।
91.1 कहि दुर्बचन क्रुद्ध दसकन्धर । कुलिस समान लाग छाँड़ै सर ॥ नानाकार सिली मुख धाये । दिसि अरु बिदिस गगन महि छाये ॥
kahi durbacana kruddha dasakandhara | kulisa samāna lāga chām̐r̤ai sara || nānākāra silī mukha dhāye | disi aru bidisa gagana mahi chāye ||
91.2 पावक-सर छाँड़ेउ रघुबीरा । छन यह जरे निसाचर तीरा ॥ छाडिसि तीव्र सक्ति खिसिआई । बान सङ्ग प्रभु फेरि पठाई ॥
pāvaka-sara chām̐r̤eu raghubīrā | chana yaha jare nisācara tīrā || chāḍisi tīvra sakti khisiāī | bāna saṅga prabhu pheri paṭhāī ||
91.3 कोटिक चक्र त्रिसूल पबारै । बिनु प्रयास प्रभु काटि निवारै ॥ निफल होहिं रावन सर कैसें । खल के सकल मनोरथ जैसें ॥
koṭika cakra trisūla pabārai | binu prayāsa prabhu kāṭi nivārai || niphala hohiṃ rāvana sara kaiseṃ | khala ke sakala manoratha jaiseṃ ||
91.4 तब सत बान सारथी मारेसि । परेउ भूमि जय राम पुकारेसि ॥ राम कृपा करि सूत उठावा । तब प्रभु परम क्रोध कहँ पावा ॥
taba sata bāna sārathī māresi | pareu bhūmi jaya rāma pukāresi || rāma kṛpā kari sūta uṭhāvā | taba prabhu parama krodha kaham̐ pāvā ||
91.छं॰ 1 छन्द भये क्रुद्ध जुद्ध बिरुद्ध रघुपति, त्रोन सायक कसमसे । कोदंड धुनि अति-चंड सुनि मनुजाद भय मारुत ग्रसे ॥ मन्दोदरी-उर-कम्प कम्पति, कमठ-भू-भूधर त्रसे । चिक्करहिँ दिग्गज दसन गहि महि, देखि कौतुक सुर हँसे ॥
bhaye kruddha juddha biruddha raghupati, trona sāyaka kasamase | kodaṃḍa dhuni ati-caṃḍa suni manujāda bhaya māruta grase || mandodarī-ura-kampa kampati, kamaṭha-bhū-bhūdhara trase | cikkarahim̐ diggaja dasana gahi mahi, dekhi kautuka sura ham̐se ||
दो॰ 91 दोहा तानेउ चाप श्रवन लगि, छाँड़े बिसिख कराल । राम-मारगन-गन चले, लहलहात जनु ब्याल ॥
tāneu cāpa śravana lagi, chām̐r̤e bisikha karāla | rāma-māragana-gana cale, lahalahāta janu byāla ||
पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0
← लंकाकाण्ड · अध्याय 90 रावण की डींग और तीन प्रकार के पुरुष लंकाकाण्ड · अध्याय 92 → कटते ही फिर उग आते सिर और भुजाएँ