लंकाकाण्ड

अध्याय 72: रावण का शोक और मेघनाद का दम्भ

7 श्लोक · 72 में से 121

इस अध्याय में क्या होता है

रावण का शोक और मेघनाद का दम्भ

दिन ढलने पर दोनों सेनाएँ लौटती हैं, योद्धा बहुत थके हैं। रघुनाथ की कृपा से वानरों का बल ऐसे बढ़ता है जैसे सूखी घास पाकर आग, और निशाचर दिन-रात ऐसे घटते हैं जैसे अपने मुँह से कहने पर पुण्य। रावण विलाप करता है और भाई का सिर बार-बार छाती से लगाता है। स्त्रियाँ छाती पीटकर रोती हैं और कुम्भकर्ण का बल बखानती हैं। तभी मेघनाद आकर पिता को समझाता है: कल मेरा पुरुषार्थ देखना। इष्टदेव से मुझे जो बल और रथ मिला है, वह मैंने अभी तक नहीं दिखाया। ऐसे डींग मारते सवेरा हो जाता है। वानर चारों द्वारों पर डट जाते हैं और भयंकर युद्ध छिड़ता है। मेघनाद मायामय रथ पर चढ़कर आकाश में जाता है और अट्टहास करता है, जिससे वानर-सेना डर जाती है।

72.1

दिन कें अन्त फिरीं दोउ अनी । समर भई सुभटन्ह श्रम घनी ॥
राम कृपाँ कपि दल बल बाढ़ा । जिमि तृन पाइ लाग अति डाढ़ा ॥

dina keṃ anta phirīṃ dou anī | samara bhaī subhaṭanha śrama ghanī ||
rāma kṛpām̐ kapi dala bala bār̤hā | jimi tṛna pāi lāga ati ḍār̤hā ||

72.2

छीजहिँ निसिचर दिन अरु राती । निज मुख कहें सुकृत जेहि भाँती ॥
बहु बिलाप दसकन्धर करई । बन्धु सीस पुनि पुनि उर धरई ॥

chījahim̐ nisicara dina aru rātī | nija mukha kaheṃ sukṛta jehi bhām̐tī ||
bahu bilāpa dasakandhara karaī | bandhu sīsa puni puni ura dharaī ||

72.3

रोवहिं नारि हृदय हति पानी । तासु तेज बल बिपुल बखानी ॥
मेघनाद तेहि अवसर आवा । कहि बहु कथा पिता समुझायउ ॥

rovahiṃ nāri hṛdaya hati pānī | tāsu teja bala bipula bakhānī ||
meghanāda tehi avasara āvā | kahi bahu kathā pitā samujhāyau ||

72.4

देखेहु कालि मोरि मनुसाई । अबहिं बहुत का करउँ बड़ाई ॥
इष्टदेव साँ बल रथ पायउँ । सो बल तात न तोहि देखायउँ ॥

dekhehu kāli mori manusāī | abahiṃ bahuta kā karaum̐ bar̤āī ||
iṣṭadeva sām̐ bala ratha pāyaum̐ | so bala tāta na tohi dekhāyaum̐ ||

72.5

एहि बिधि जल्पत भयउ बिहाना । चहुँ दुआर लागे कपि नाना ॥
इत कपि-भालु काल सम बीरा । उत रजनीचर अति रनधीरा ॥

ehi bidhi jalpata bhayau bihānā | cahum̐ duāra lāge kapi nānā ||
ita kapi-bhālu kāla sama bīrā | uta rajanīcara ati ranadhīrā ||

72.6

लरहिँ सुभट निज निज जय हेतू । बरनि न जाइ समर खगकेतू ॥

larahim̐ subhaṭa nija nija jaya hetū | barani na jāi samara khagaketū ||

दो॰ 72दोहा

मेघनाद माया-मय,-रथ चढ़ि गयउ अकास ।
गर्जेउ अट्टहास करि, भइ कपि कटकहि त्रास ॥

meghanāda māyā-maya,-ratha car̤hi gayau akāsa |
garjeu aṭṭahāsa kari, bhai kapi kaṭakahi trāsa ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0