कुम्भकरन मन दीख बिचारी । हति छन माँझ निसाचर धारी ॥
भा अति क्रुद्ध महाबल बीरा । कियो मृगनायक-नाद गम्भीरा ॥
kumbhakarana mana dīkha bicārī | hati chana mām̐jha nisācara dhārī ||
bhā ati kruddha mahābala bīrā | kiyo mṛganāyaka-nāda gambhīrā ||
5 श्लोक · 69 में से 121
कुम्भकर्ण देखता है कि क्षण भर में उसकी सारी सेना मार दी गई। तब वह महाबली क्रोधित होकर सिंह जैसा गम्भीर नाद करता है और पर्वत उखाड़कर वहाँ फेंकता है जहाँ बड़े वानर योद्धा हैं। प्रभु बाणों से पर्वतों को काटकर धूल के समान कर देते हैं। फिर रघुनाथ कुपित होकर धनुष तानते हैं और बहुत-से भयंकर बाण छोड़ते हैं। बाण उसके शरीर में घुसकर पार निकल जाते हैं, मानो बादल में बिजलियाँ समा रही हों। उसके काले शरीर से बहता रक्त ऐसा दिखता है जैसे काजल के पर्वत से गेरू के झरने बह रहे हों। वानर दौड़ते हैं तो वह हँस पड़ता है। महानाद करके वह करोड़ों वानरों को पकड़कर गजराज की तरह धरती पर पटकता है और रावण की शपथ खाता है।
कुम्भकरन मन दीख बिचारी । हति छन माँझ निसाचर धारी ॥
भा अति क्रुद्ध महाबल बीरा । कियो मृगनायक-नाद गम्भीरा ॥
kumbhakarana mana dīkha bicārī | hati chana mām̐jha nisācara dhārī ||
bhā ati kruddha mahābala bīrā | kiyo mṛganāyaka-nāda gambhīrā ||
कोपि महीधर लेइ उपारी । डारइ जहँ मर्कट-भट-भारी ॥
आवत देखि सैल प्रभू भारे । सरन्हि काटि रज सम करि डारे ॥
kopi mahīdhara lei upārī | ḍārai jaham̐ markaṭa-bhaṭa-bhārī ||
āvata dekhi saila prabhū bhāre | saranhi kāṭi raja sama kari ḍāre ||
पुनि धनु तानि कोपि रघुनायक । छाँड़े अति कराल बहु सायक ॥
तन मह प्रबिसि निसरि सर जाहीँ । जनु दामिनि घन माझ समाहीं ॥
puni dhanu tāni kopi raghunāyaka | chām̐r̤e ati karāla bahu sāyaka ||
tana maha prabisi nisari sara jāhīm̐ | janu dāmini ghana mājha samāhīṃ ||
सोनित स्त्रवत सोह तन कारे । जनु कज्जल-गिरि गेरु पनारे ॥
बिकल बिलोकि भालु कपि धाये । बिहँसा जबहिँ निकट कपि आये ॥
sonita stravata soha tana kāre | janu kajjala-giri geru panāre ||
bikala biloki bhālu kapi dhāye | biham̐sā jabahim̐ nikaṭa kapi āye ||
महानाद करि गर्जा, कोटि कोटि गहि कीस ।
महि पटकई गजराज इव, सपथ करइ दससीस ॥
mahānāda kari garjā, koṭi koṭi gahi kīsa |
mahi paṭakaī gajarāja iva, sapatha karai dasasīsa ||
पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0