लंकाकाण्ड

अध्याय 68: श्रीराम के बाणों से निशाचर-सेना का नाश

5 श्लोक · 68 में से 121

इस अध्याय में क्या होता है

श्रीराम के बाणों से निशाचर-सेना का नाश

हाथ में शार्ङ्ग धनुष लेकर और कमर में तरकश कसकर रघुनाथ शत्रु-दल का नाश करने चलते हैं। पहले प्रभु धनुष की टंकार करते हैं, जिसके घोर शब्द से शत्रु-सेना बहरी हो जाती है। फिर सत्यप्रतिज्ञ प्रभु एक लाख बाण छोड़ते हैं, जो पंखों वाले कालसर्प जैसे चलते हैं और भयंकर निशाचर योद्धा कटने लगते हैं। चरण, छाती, सिर और भुजाएँ कट जाती हैं, बहुत-से वीरों के सौ-सौ टुकड़े हो जाते हैं। घायल चक्कर खाकर गिरते हैं, फिर उठकर लड़ने लगते हैं। बाण लगते ही वे बादल की तरह गरजते हैं, बहुत-से भाग जाते हैं। बिना सिर के धड़ मारो-मारो चिल्लाते दौड़ते हैं। क्षण भर में प्रभु के बाण भयानक निशाचरों को काट डालते हैं और फिर सब रघुवीर के तरकश में लौट आते हैं।

68.1

कर सारङ्ग साजि कटि भाथा । अरि दल दलन चले रघुनाथा ॥
प्रथम कीन्ह प्रभु धनुष टँकोरा । रिपु-दल बधिर भयउ मुनि सोरा ॥

kara sāraṅga sāji kaṭi bhāthā | ari dala dalana cale raghunāthā ||
prathama kīnha prabhu dhanuṣa ṭam̐korā | ripu-dala badhira bhayau muni sorā ||

68.2

सत्यसन्ध छाँड़े सर लच्छा । कालसर्प जनु चले सपच्छा ॥
जहँ तहँ चले बिपुल नाराचा । लगे कटन भट बिकट पिसाचा ॥

satyasandha chām̐r̤e sara lacchā | kālasarpa janu cale sapacchā ||
jaham̐ taham̐ cale bipula nārācā | lage kaṭana bhaṭa bikaṭa pisācā ||

68.3

कटहिं चरन उर सिर भुजदंडा । बहुतक बीर होहिं सत खंडा ॥
घुर्मि घुर्मि घायल महि परहीं । उठि सम्भारि सुभट पुनि लरहीं ॥

kaṭahiṃ carana ura sira bhujadaṃḍā | bahutaka bīra hohiṃ sata khaṃḍā ||
ghurmi ghurmi ghāyala mahi parahīṃ | uṭhi sambhāri subhaṭa puni larahīṃ ||

68.4

लागत बान जलद जिमि गाजहिँ । बहुतक देखि कठिन सर भाजहिँ ॥
रुंड प्रचंड मुंड बिनु धावहिँ । धरु धरु मारू मारु धुनि गावहिं ॥

lāgata bāna jalada jimi gājahim̐ | bahutaka dekhi kaṭhina sara bhājahim̐ ||
ruṃḍa pracaṃḍa muṃḍa binu dhāvahim̐ | dharu dharu mārū māru dhuni gāvahiṃ ||

दो॰ 68दोहा

छन महुँ प्रभु के सायकन्हि, काटे बिकट पिसाच ।
पुनि रघुबीर निषङ्ग मह, प्रबिसे सब नाराच ॥

chana mahum̐ prabhu ke sāyakanhi, kāṭe bikaṭa pisāca |
puni raghubīra niṣaṅga maha, prabise saba nārāca ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0