हाथ में शार्ङ्ग धनुष लेकर और कमर में तरकश कसकर रघुनाथ शत्रु-दल का नाश करने चलते हैं। पहले प्रभु धनुष की टंकार करते हैं, जिसके घोर शब्द से शत्रु-सेना बहरी हो जाती है। फिर सत्यप्रतिज्ञ प्रभु एक लाख बाण छोड़ते हैं, जो पंखों वाले कालसर्प जैसे चलते हैं और भयंकर निशाचर योद्धा कटने लगते हैं। चरण, छाती, सिर और भुजाएँ कट जाती हैं, बहुत-से वीरों के सौ-सौ टुकड़े हो जाते हैं। घायल चक्कर खाकर गिरते हैं, फिर उठकर लड़ने लगते हैं। बाण लगते ही वे बादल की तरह गरजते हैं, बहुत-से भाग जाते हैं। बिना सिर के धड़ मारो-मारो चिल्लाते दौड़ते हैं। क्षण भर में प्रभु के बाण भयानक निशाचरों को काट डालते हैं और फिर सब रघुवीर के तरकश में लौट आते हैं।