लंकाकाण्ड

अध्याय 67: कुम्भकर्ण का संहार और श्रीराम का आगे बढ़ना

5 श्लोक · 67 में से 121

इस अध्याय में क्या होता है

कुम्भकर्ण का संहार और श्रीराम का आगे बढ़ना

कुम्भकर्ण क्रोधित काल की तरह आगे बढ़ता है। करोड़ों वानरों को पकड़कर खा जाता है, मानो टिड्डियाँ पहाड़ की गुफा में समा रही हों। करोड़ों को शरीर से मसल देता है, करोड़ों को मींजकर धूल में मिला देता है। भालू और वानर उसके मुख, नाक और कानों से निकल-निकलकर भागते हैं। युद्ध के मद में वह ऐसा लगता है मानो सारे विश्व को निगल जाएगा। भागे हुए योद्धा लौटाए नहीं लौटते; न उन्हें सूझता है, न पुकार सुनाई देती है। यह सुनकर निशाचरों की सेना भी दौड़ पड़ती है। श्रीराम अपनी सेना को व्याकुल और शत्रु-दल को अनेक प्रकार से आते देखते हैं। तब कमल-नयन प्रभु कहते हैं: सुग्रीव, विभीषण और लक्ष्मण, तुम सेना को सँभालो; दुष्टों के इस दल को मैं देखता हूँ।

67.1

कुम्भकरन रन रङ्ग विरुद्धा । सन्मुख चला काल जनु क्रुद्धा ॥
कोटि कोटि कपि धरि धरि खाई । जनु टीड़ी गिरि-गुहाँ-समाई ॥

kumbhakarana rana raṅga viruddhā | sanmukha calā kāla janu kruddhā ||
koṭi koṭi kapi dhari dhari khāī | janu ṭīr̤ī giri-guhām̐-samāī ||

67.2

कोटिन्ह गहि सरीर सन मर्दा । कोटिन्ह मीजि मिलब महि गर्दा ॥
मुख नासा श्रवनन्हि कीं बाटा । निसरि पराहिँ भालु कपि ठाटा ॥

koṭinha gahi sarīra sana mardā | koṭinha mīji milaba mahi gardā ||
mukha nāsā śravananhi kīṃ bāṭā | nisari parāhim̐ bhālu kapi ṭhāṭā ||

67.3

रन-मद-मत्त निसाचर दर्पा । बिस्व ग्रसिहि जनु एहि बिधि अर्पा ॥
मुरे सुभट सब फिरहिँ न फेरे । सूझ न नयन सुनहिँ नहिँ टेरे ॥

rana-mada-matta nisācara darpā | bisva grasihi janu ehi bidhi arpā ||
mure subhaṭa saba phirahim̐ na phere | sūjha na nayana sunahim̐ nahim̐ ṭere ||

67.4

कुम्भकरन कपि फौज बिडारी । सुनि धाई रजनीचर-धारी ॥
देखी राम बिकल कटकाई । रिपु अनीक नाना विधि आई ॥

kumbhakarana kapi phauja biḍārī | suni dhāī rajanīcara-dhārī ||
dekhī rāma bikala kaṭakāī | ripu anīka nānā vidhi āī ||

दो॰ 67दोहा

सुनु सुग्रीव बिभीषन, अनुज सँभारेहु सैन ।
मैं देखउँ खल-जल-दलहि, बोले राजिव नैन ॥

sunu sugrīva bibhīṣana, anuja sam̐bhārehu saina |
maiṃ dekhaum̐ khala-jala-dalahi, bole rājiva naina ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0