लंकाकाण्ड

अध्याय 66: सुग्रीव का छूटना और कुम्भकर्ण के नाक-कान काटना

6 श्लोक · 66 में से 121

इस अध्याय में क्या होता है

सुग्रीव का छूटना और कुम्भकर्ण के नाक-कान काटना

भगवान शिव उमा से कहते हैं कि रघुनाथ नरलीला कर रहे थे, जैसे गरुड़ सर्पों के झुण्ड में खेलता हो। जिनकी टेढ़ी भौंह काल को भी खा जाती है, उन्हें ऐसी लड़ाई की आवश्यकता नहीं; वे इसलिए करते हैं कि उनकी पावन कीर्ति फैले और लोग उसे गाकर भवसागर पार करें। हनुमान जागकर सुग्रीव को खोजते हैं। सुग्रीव भी होश में आते हैं; कुम्भकर्ण उन्हें मरा समझता है, तभी वे छूटकर उसके नाक-कान दाँतों से काट लेते हैं और गरजकर आकाश में उड़ जाते हैं। वह पैर पकड़कर उन्हें पछाड़ता है, पर सुग्रीव फुर्ती से उठकर फिर मारते हैं और प्रभु के पास जाकर जयकार करते हैं। नाक-कान कटा कुम्भकर्ण ग्लानि और क्रोध से लौटता है। वानर रघुवंशमणि की जय बोलकर उस पर पर्वत और वृक्ष बरसाते हैं।

66.1

उमा करत रघुपति नरलीला । खेलत गरुड़ जिमि अहिगन मीला ॥
भृकुटि भङ्ग जो कालहि खाई । ताहि कि सोहइ ऐसि लराई ॥

umā karata raghupati naralīlā | khelata garur̤a jimi ahigana mīlā ||
bhṛkuṭi bhaṅga jo kālahi khāī | tāhi ki sohai aisi larāī ||

66.2

जग-पावनि कीरति बिस्तरिहहिं । गाइ गाइ भवनिधि नर तरिहहिँ ॥
मुरुछा गइ मारुत-सुत जागा । सुग्रीवहिँ तब खोजन लागा ॥

jaga-pāvani kīrati bistarihahiṃ | gāi gāi bhavanidhi nara tarihahim̐ ||
muruchā gai māruta-suta jāgā | sugrīvahim̐ taba khojana lāgā ||

66.3

सुग्रीवहु कै मुरुछा बीती । निबुक गयो तेहि मृतक प्रतीती ॥
काटेसि दसन नासिका काना । गरजि अकास चलउ तेहिं जाना ॥

sugrīvahu kai muruchā bītī | nibuka gayo tehi mṛtaka pratītī ||
kāṭesi dasana nāsikā kānā | garaji akāsa calau tehiṃ jānā ||

66.4

गहेउ चरन धरि धरनि पछारा । अति लाघवँ उठि पुनि तेहि मारा ॥
पुनि आयउ प्रभु पहिँ बलवाना । जयति जयति जय कृपानिधाना ॥

gaheu carana dhari dharani pachārā | ati lāghavam̐ uṭhi puni tehi mārā ||
puni āyau prabhu pahim̐ balavānā | jayati jayati jaya kṛpānidhānā ||

66.5

नाक कान काटे जियँ जानी । फिरा क्रोध करि भइ मन ग्लानी ॥
सहज-भीम पुनि बिनु श्रुति नासा । देखत कपि दल उपजी त्रासा ॥

nāka kāna kāṭe jiyam̐ jānī | phirā krodha kari bhai mana glānī ||
sahaja-bhīma puni binu śruti nāsā | dekhata kapi dala upajī trāsā ||

दो॰ 66दोहा

जय जय जय रघुबंस मनि, धाये कपि दै हूह ।
एकहि बार तासु पर, छाडेन्हि गिरि-तरु जूह ॥

jaya jaya jaya raghubaṃsa mani, dhāye kapi dai hūha |
ekahi bāra tāsu para, chāḍenhi giri-taru jūha ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0