लंकाकाण्ड

अध्याय 6: मंदोदरी रावण से सीता लौटाने की विनती करती है

6 श्लोक · 6 में से 121

इस अध्याय में क्या होता है

मंदोदरी रावण से सीता लौटाने की विनती करती है

रावण हँसकर अपनी व्याकुलता छिपाता है और महल चला जाता है। मंदोदरी ने सुना है कि प्रभु आ गए हैं और खेल ही खेल में समुद्र बँधवा दिया। वह पति का हाथ पकड़कर भीतर लाती है, चरणों में सिर नवाकर आँचल पसारती है और मधुर वाणी में कहती है: प्रियतम, क्रोध छोड़कर सुनिए। वैर उसी से कीजिए जिसे बुद्धि या बल से जीत सकें। आपमें और रघुपति में वही अन्तर है जो जुगनू और सूर्य में है। जिन्होंने बलवान मधु-कैटभ को मारा, दिति के महावीर पुत्रों का संहार किया, बलि को बाँधा और सहस्रबाहु को मारा, वही पृथ्वी का भार हरने अवतरित हुए हैं। उनके चरणों में सिर नवाकर जानकी उन्हें सौंप दीजिए, पुत्र को राज्य देकर वन में रघुनाथ का भजन कीजिए।

6.1

निज बिकलता बिचारि बहोरी । बिहँसि गयउ ग्रह करि भय भोरी ॥
मंदोदरीं सुन्यो प्रभु आयो । कौतुक ही पाथोधि बँधायो ॥

nija bikalatā bicāri bahorī | biham̐si gayau graha kari bhaya bhorī ||
maṃdodarīṃ sunyo prabhu āyo | kautuka hī pāthodhi bam̐dhāyo ||

6.2

कर गहि पतिहि भवन निज आनी । बोली परम-मनोहर बानी ॥
चरन नाइ सिर अञ्चल रोपा । सुनहु बचन पिय परिहरि कोपा ॥

kara gahi patihi bhavana nija ānī | bolī parama-manohara bānī ||
carana nāi sira añcala ropā | sunahu bacana piya parihari kopā ||

6.3

नाथ भैर कीजे ताही सोँ । बुधि बल सकिअ जीति जाही सोँ ॥
तुम्हहि रघुपतिहि अन्तर कैसा । खलु खद्योत दिनकरहि जैसा ॥

nātha bhaira kīje tāhī som̐ | budhi bala sakia jīti jāhī som̐ ||
tumhahi raghupatihi antara kaisā | khalu khadyota dinakarahi jaisā ||

6.4

अति बल मधु-कैटभ जेहिं मारे । महाबीर दितिसुत सङ्घारे ॥
जेहिं बलि बाँधि सहजभुज मारा । सोइ अवतरेउ हरन महि-भारा ॥

ati bala madhu-kaiṭabha jehiṃ māre | mahābīra ditisuta saṅghāre ||
jehiṃ bali bām̐dhi sahajabhuja mārā | soi avatareu harana mahi-bhārā ||

6.5

तासु बिरोध न कीजिय नाथा । काल करम जिव जाकें हाथा ॥

tāsu birodha na kījiya nāthā | kāla karama jiva jākeṃ hāthā ||

दो॰ 6दोहा

रामहि सौपि जानकी, नाइ कमल-पद माथ ।
सुत कहँ राज समर्पि बन, जाइ भजिअ रघुनाथ ॥

rāmahi saupi jānakī, nāi kamala-pada mātha |
suta kaham̐ rāja samarpi bana, jāi bhajia raghunātha ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0