लंकाकाण्ड

अध्याय 5: सेना पार उतरी, रावण ने सेतु की बात सुनी

6 श्लोक · 5 में से 121

इस अध्याय में क्या होता है

सेना पार उतरी, रावण ने सेतु की बात सुनी

जलचरों का यह कौतुक देखकर दोनों भाई मुस्कराते हुए आगे बढ़ते हैं। श्रीराम सेना सहित समुद्र पार उतरकर डेरा डालते हैं और वानरों को आज्ञा देते हैं कि जाकर सुन्दर फल-मूल खाओ। राम के लिए सब वृक्ष ऋतु और समय की मर्यादा छोड़कर फल उठे। वानर मीठे फल खाते, पेड़ हिलाते और लंका की ओर पर्वत-शिखर फेंकते हैं। जहाँ कहीं कोई राक्षस घूमता मिलता, उसे घेरकर खूब नचाते, फिर दाँतों से उसकी नाक और कान काटकर प्रभु का सुयश सुनाते और जाने देते। नाक-कान कटे वे राक्षस रावण को सब समाचार सुनाते हैं। समुद्र बँध जाने की बात कानों में पड़ते ही दशमुख व्याकुल होकर बोल उठता है, और मानो विश्वास न कर पाने से समुद्र के दस नाम एक साथ दोहराता है।

5.1

अस कौतुक बिलोकि दोउ भाई । बिहँसि चले कृपाल रघुराई ॥
सेन सहित उतरे रघुबीरा । कहि न जाइ कपि-जूथप-भीरा ॥

asa kautuka biloki dou bhāī | biham̐si cale kṛpāla raghurāī ||
sena sahita utare raghubīrā | kahi na jāi kapi-jūthapa-bhīrā ||

5.2

सिन्धु पार प्रभु डेरा कीन्हा । सकल कपिन्ह कहँ आयसु दीन्हा ॥
खाहु जाइ फल मूल सुहाये । सुनत भालु कपि जहँ तहँ धाये ॥

sindhu pāra prabhu ḍerā kīnhā | sakala kapinha kaham̐ āyasu dīnhā ||
khāhu jāi phala mūla suhāye | sunata bhālu kapi jaham̐ taham̐ dhāye ||

5.3

सब तरु फरे राम-हित-लागी । रितु अरु कुरितु काल गति त्यागी ॥
खाहिँ मधुर-पाल बटप हलावहिँ । लङ्का सनमुख सिखर चलावहिं ॥

saba taru phare rāma-hita-lāgī | ritu aru kuritu kāla gati tyāgī ||
khāhim̐ madhura-pāla baṭapa halāvahim̐ | laṅkā sanamukha sikhara calāvahiṃ ||

5.4

जहँ कहुँ फिरत निसाचर पावहिं । घेरि सकल बहु नाच नचावहिं ॥
दसनन्हि काटि नासिका काना । कहि प्रभु सुजसु देहिँ तब जाना ॥

jaham̐ kahum̐ phirata nisācara pāvahiṃ | gheri sakala bahu nāca nacāvahiṃ ||
dasananhi kāṭi nāsikā kānā | kahi prabhu sujasu dehim̐ taba jānā ||

5.5

जिन्ह कर नासा कान निपाता । तिन्ह रावनहि कही सब बाता ॥
सुनत स्रवन बारिधि-बन्धाना । दस मुख बोलि उठा अकुलाना ॥

jinha kara nāsā kāna nipātā | tinha rāvanahi kahī saba bātā ||
sunata sravana bāridhi-bandhānā | dasa mukha boli uṭhā akulānā ||

दो॰ 5दोहा

बांध्यो बननिधि नीरनिधि, जलधि सिन्धु बारीस ।
सत्य तोयनिधि कम्पति, उदधि पयोधि नदीस ॥

bāṃdhyo bananidhi nīranidhi, jaladhi sindhu bārīsa |
satya toyanidhi kampati, udadhi payodhi nadīsa ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0