लंकाकाण्ड

अध्याय 53: लक्ष्मण रण में उतरे, घोर युद्ध

5 श्लोक · 53 में से 121

इस अध्याय में क्या होता है

लक्ष्मण रण में उतरे, घोर युद्ध

लक्ष्मण के नेत्र रक्त जैसे लाल हैं, छाती चौड़ी और भुजाएँ विशाल, शरीर हिमालय जैसा, कुछ ललाई लिए। इधर रावण अपने योद्धाओं को भेजता है, जो अनेक अस्त्र-शस्त्र लेकर दौड़ते हैं। पर्वत, नख और वृक्ष ही जिनके आयुध हैं, वे वानर जय राम पुकारते हुए दौड़ पड़ते हैं। सब जोड़ी से जोड़ी भिड़ जाते हैं, दोनों ओर जीत की इच्छा कम नहीं। वानर घूँसों और लातों से मारते, दाँतों से काटते हैं। मारो, मारो, पकड़ो, पकड़ो, सिर तोड़ दो, भुजा पकड़कर उखाड़ लो, यह शब्द नवों खण्डों में भर जाता है। भयानक धड़ जहाँ-तहाँ दौड़ते हैं। आकाश से देवता यह कौतुक देखते हैं, कभी विस्मित, कभी आनन्दित। गड्ढों में भरा रक्त जम गया है और ऊपर धूल उड़ रही है, मानो अंगारों के ढेरों पर राख का धुआँ छाया हो।

53.1

छतज नयन उर बाहु बिसाला । हिमगिरि-निभ-तनु-कछु एक लाला ॥
इहाँ दसानन सुभट पठाये । नाना अस्त्र सस्त्र गहि धाये ॥

chataja nayana ura bāhu bisālā | himagiri-nibha-tanu-kachu eka lālā ||
ihām̐ dasānana subhaṭa paṭhāye | nānā astra sastra gahi dhāye ||

53.2

भूधर-नख-बिटपायुध-धारी । धाये कपि जय राम पुकारी ॥
भिरे सकल जोरिहि सन जोरी । इत उत जय-इच्छा नहिँ थोरी ॥

bhūdhara-nakha-biṭapāyudha-dhārī | dhāye kapi jaya rāma pukārī ||
bhire sakala jorihi sana jorī | ita uta jaya-icchā nahim̐ thorī ||

53.3

मुठिकन्ह लातन्ह दातन्ह काटहिं । कपि-जयसील मारि पुनि डाटहिं ॥
मारु मार धरु धरु धरु मारू । सीस तोरि गहि भुजा उपारू ॥

muṭhikanha lātanha dātanha kāṭahiṃ | kapi-jayasīla māri puni ḍāṭahiṃ ||
māru māra dharu dharu dharu mārū | sīsa tori gahi bhujā upārū ||

53.4

असि रव पूरि रही नव-खंडा । धावहिं जहँ तहँ रुंड प्रचंडा ॥
देखहिँ कौतुक नभ सुर-बृन्दा । कबहुँक बिसमय कबहुँ अनन्दा ॥

asi rava pūri rahī nava-khaṃḍā | dhāvahiṃ jaham̐ taham̐ ruṃḍa pracaṃḍā ||
dekhahim̐ kautuka nabha sura-bṛndā | kabahum̐ka bisamaya kabahum̐ anandā ||

दो॰ 53दोहा

रुधिर गाड़ भरि अरि जम्यो, ऊपर धूरि उड़ाइ ।
जनु अँगार-रासिन्ह-पर, मृतक धूम रह्यो छाइ ॥

rudhira gār̤a bhari ari jamyo, ūpara dhūri ur̤āi |
janu am̐gāra-rāsinha-para, mṛtaka dhūma rahyo chāi ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0