लंकाकाण्ड

अध्याय 49: माल्यवान का अपमान, मेघनाद का प्रण

7 श्लोक · 49 में से 121

इस अध्याय में क्या होता है

माल्यवान का अपमान, मेघनाद का प्रण

माल्यवान कहता है: वैर छोड़कर वैदेही को लौटा दो और परम स्नेही कृपानिधि को भजो। उसके वचन रावण को बाण जैसे लगते हैं: रे अभागे, मुँह काला करके चला जा; बूढ़ा न होता तो तुझे मार डालता, अब अपनी आँखें मुझे न दिखाना। माल्यवान यह जानकर कि प्रभु इसे मारना चाहते हैं, चला जाता है। तब मेघनाद क्रोध से कहता है: सबेरे मेरा कौतुक देखना, बहुत करूँगा, कहूँ क्या थोड़ा। पुत्र के वचन सुनकर रावण को भरोसा आता है और वह उसे प्रेम से गोद में बैठा लेता है। विचार करते-करते सबेरा हो जाता है और वानर फिर चारों द्वारों पर आ लगते हैं। राक्षस अनेक अस्त्र लेकर दौड़ते हैं और गढ़ से पर्वत-शिखर ढहाते हैं। यह सुनकर मेघनाद गढ़ से उतरकर डंका बजाता सामने आता है।

49.1

परिहरि बयर देहु बैदेही । भजहु कृपानिधि परम सनेही ॥
ताके बचन बान सम लागे । करिआ मुख करि जाहि अभागे ॥

parihari bayara dehu baidehī | bhajahu kṛpānidhi parama sanehī ||
tāke bacana bāna sama lāge | kariā mukha kari jāhi abhāge ||

49.2

बूढ़ भएसि न त मरतेउँ तोही । अब जनि नयन देखावसि मोही ॥
तेहि अपने मन अस अनुमाना । बध्यो चहत एहि कृपानिधाना ॥

būr̤ha bhaesi na ta marateum̐ tohī | aba jani nayana dekhāvasi mohī ||
tehi apane mana asa anumānā | badhyo cahata ehi kṛpānidhānā ||

49.3

सो उठि गयउ कहत दुर्बादा । तब सकोप बोलेउ घननादा ॥
कौतुक प्रात देखिअहु मोरा । करिहउँ बहुत कहउँ का थोरा ॥

so uṭhi gayau kahata durbādā | taba sakopa boleu ghananādā ||
kautuka prāta dekhiahu morā | karihaum̐ bahuta kahaum̐ kā thorā ||

49.4

सुनि सुत बचन भरोसा आवा । प्रीति समेत अङ्क बैठावा ॥
करत बिचार भयउ भिनुसारा । लागे कपि पुनि चहूँ दुआरा ॥

suni suta bacana bharosā āvā | prīti sameta aṅka baiṭhāvā ||
karata bicāra bhayau bhinusārā | lāge kapi puni cahūm̐ duārā ||

49.5

कोपि कपिन्ह दुर्घट-गढ़ घेरा । नगर कोलाहल भयउ घनेरा ॥
बिबिधायुध-धर निसिचर धाये । गढ़ ते पर्वत-सिखर ढहाये ॥

kopi kapinha durghaṭa-gar̤ha gherā | nagara kolāhala bhayau ghanerā ||
bibidhāyudha-dhara nisicara dhāye | gar̤ha te parvata-sikhara ḍhahāye ||

49.छं॰ 1छन्द

ढाहे महीधर-सिखर-कोटिन्ह, बिबिध बिधि गोला चले ।
घहरात जिमि पबिपात गर्जत, जनु प्रलय के बादले ॥
मर्कट बिकट भट जुटत कटत न, लरत तनु जर्जर भए ।
गहि सैल तेइ गढ़ पर चलावहिं, जहँ सो तहँ निसिचर हये ॥

ḍhāhe mahīdhara-sikhara-koṭinha, bibidha bidhi golā cale |
ghaharāta jimi pabipāta garjata, janu pralaya ke bādale ||
markaṭa bikaṭa bhaṭa juṭata kaṭata na, larata tanu jarjara bhae |
gahi saila tei gar̤ha para calāvahiṃ, jaham̐ so taham̐ nisicara haye ||

दो॰ 49दोहा

मेघनाद सुनि श्रवन अस, गढ़ पुनि छेंका आइ ।
उतर्यो बीर दुर्ग तेँ बीर बर, सनमुख चलेउ बजाइ ॥

meghanāda suni śravana asa, gar̤ha puni cheṃkā āi |
utaryo bīra durga tem̐ bīra bara, sanamukha caleu bajāi ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0