सकल मरम रघुनायक जाना । लिये बोलि अङ्गद हनुमाना ॥
समाचार सब कहि समुझाए । सुनत कोपि-कपि-कुञ्जर धाये ॥
sakala marama raghunāyaka jānā | liye boli aṅgada hanumānā ||
samācāra saba kahi samujhāe | sunata kopi-kapi-kuñjara dhāye ||
5 श्लोक · 47 में से 121
रघुनायक सारा भेद जान लेते हैं। वे अंगद और हनुमान को बुलाकर सब समाचार समझाते हैं; सुनते ही दोनों कपिश्रेष्ठ क्रोध करके दौड़ पड़ते हैं। फिर कृपालु प्रभु हँसकर धनुष चढ़ाते हैं और तुरन्त अग्निबाण छोड़ते हैं। ऐसा प्रकाश होता है कि कहीं अंधकार नहीं रहता, जैसे ज्ञान उदय होने पर संशय मिट जाते हैं। प्रकाश पाकर भालू और वानर थकान और भय से रहित होकर हर्ष से दौड़ते हैं। हनुमान और अंगद की हाँक सुनते ही राक्षस भागते हैं और भालू-वानर उन्हें पकड़कर धरती पर पटकते हैं। कुछ को पैर पकड़कर समुद्र में डाल देते हैं, जहाँ मगर, साँप और मछलियाँ उन्हें पकड़-पकड़कर खा जाते हैं। कुछ मारे गए, कुछ घायल हुए, कुछ भागकर गढ़ पर चढ़ गए। शत्रु का बल तोड़कर भालू-वानर गरजते हैं।
सकल मरम रघुनायक जाना । लिये बोलि अङ्गद हनुमाना ॥
समाचार सब कहि समुझाए । सुनत कोपि-कपि-कुञ्जर धाये ॥
sakala marama raghunāyaka jānā | liye boli aṅgada hanumānā ||
samācāra saba kahi samujhāe | sunata kopi-kapi-kuñjara dhāye ||
पुनि कृपाल हँसि चाप चढ़ावा । पावक-सायक सपदि चलावा ॥
भयउ प्रकास कतहुँ तम नाहीं । ज्ञान उदयँ जिमि संसय जाहीँ ॥
puni kṛpāla ham̐si cāpa car̤hāvā | pāvaka-sāyaka sapadi calāvā ||
bhayau prakāsa katahum̐ tama nāhīṃ | jñāna udayam̐ jimi saṃsaya jāhīm̐ ||
भालु-बलीमुख पाइ प्रकासा । धाये हरषि बिगत-श्रम-त्रासा ॥
हनुमान अङ्गद रन गाजे । हाँक सुनत रजनीचर भाजे ॥
bhālu-balīmukha pāi prakāsā | dhāye haraṣi bigata-śrama-trāsā ||
hanumāna aṅgada rana gāje | hām̐ka sunata rajanīcara bhāje ||
भागत भट पटकहिँ धरि धरनी । करहिँ भालु-कपि अद्भुत-करनी ॥
गहि पद डारहिँ सागर माहीँ । मकर-उरग-झष धरि धरि खाहीं ॥
bhāgata bhaṭa paṭakahim̐ dhari dharanī | karahim̐ bhālu-kapi adbhuta-karanī ||
gahi pada ḍārahim̐ sāgara māhīm̐ | makara-uraga-jhaṣa dhari dhari khāhīṃ ||
कछु मारे कछु घायल, कछु गढ़ चढ़े पराइ ।
गर्जहिँ भालु बलीमुख, रिपु-दल-बल बिचलाइ ॥
kachu māre kachu ghāyala, kachu gar̤ha car̤he parāi |
garjahim̐ bhālu balīmukha, ripu-dala-bala bicalāi ||
पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0