लंकाकाण्ड

अध्याय 46: रात्रि का युद्ध और राक्षसों का अंधकार

7 श्लोक · 46 में से 121

इस अध्याय में क्या होता है

रात्रि का युद्ध और राक्षसों का अंधकार

अंगद और हनुमान प्रभु के चरणों में सिर नवाते हैं; ऐसे वीरों को देखकर रघुपति मन में प्रसन्न होते हैं, और उनकी कृपादृष्टि से दोनों की थकान मिट जाती है। अंगद और हनुमान को लौटा जानकर भालू-वानर भी लौट आते हैं। संध्या का बल पाकर राक्षस रावण की दुहाई देकर दौड़ते हैं। दोनों दल भिड़ जाते हैं, कोई हार नहीं मानता। राक्षस सब काले हैं, वानर अनेक रंगों के। वे ऐसे लड़ते हैं मानो वर्षा और शरद के बादल पवन से प्रेरित होकर भिड़ रहे हों। सेना को डगमगाते देख सेनापति अकम्पन और अतिकाय माया करते हैं। पल भर में घोर अंधकार हो जाता है, रक्त, पत्थर और राख की वर्षा होती है। वानर एक-दूसरे को नहीं देख पाते और जहाँ-तहाँ पुकारते हैं।

46.1

प्रभु-पद-काल सील तिन्ह लाये । देखि सुभट रघुपति मन भाए ॥
राम कृपा करि जुगल निहारे । भए बिगतश्रम परम-सुखारे ॥

prabhu-pada-kāla sīla tinha lāye | dekhi subhaṭa raghupati mana bhāe ||
rāma kṛpā kari jugala nihāre | bhae bigataśrama parama-sukhāre ||

46.2

गए जानि अङ्गद हनुमाना । फिरे भालु मर्कट भट नाना ॥
जातुधान प्रदोष बल पाई । धाये करि दससीस-दोहाई ॥

gae jāni aṅgada hanumānā | phire bhālu markaṭa bhaṭa nānā ||
jātudhāna pradoṣa bala pāī | dhāye kari dasasīsa-dohāī ||

46.3

निसिचर-अनी देखि कपि फिरे । जहँ वह कटकटाइ भट-भिरे ॥
दोउ दल प्रबल पचारि पचारी । लरत सुभट नहिँ मानहिँ हारी ॥

nisicara-anī dekhi kapi phire | jaham̐ vaha kaṭakaṭāi bhaṭa-bhire ||
dou dala prabala pacāri pacārī | larata subhaṭa nahim̐ mānahim̐ hārī ||

46.4

महाबीर निसिचर सब कारे । नाना बरन बलीमुख भारे ॥
सबल जुगल दल सम-बल-जोधा । कौतुक करत लरत करि क्रोधा ॥

mahābīra nisicara saba kāre | nānā barana balīmukha bhāre ||
sabala jugala dala sama-bala-jodhā | kautuka karata larata kari krodhā ||

46.5

प्राबिट-सरद-पयोद घनेरे । लरत मनहुँ मारुत के प्रेरे ॥
अनिप अकम्पन अरु अतिकाया । बिचलत सेन कीन्हि इन्ह माया ॥

prābiṭa-sarada-payoda ghanere | larata manahum̐ māruta ke prere ||
anipa akampana aru atikāyā | bicalata sena kīnhi inha māyā ||

46.6

भयउ निमिष महँ अति अँधियारा । वृष्टि होइ रुधिरोपल-छारा ॥

bhayau nimiṣa maham̐ ati am̐dhiyārā | vṛṣṭi hoi rudhiropala-chārā ||

दो॰ 46दोहा

देखि निबिड़ तम दसहुँ दिसि, कपिदल भयउ खभार ।
एकहि एक न देखई, जहँ तहँ करहिं पुकार ॥

dekhi nibir̤a tama dasahum̐ disi, kapidala bhayau khabhāra |
ekahi eka na dekhaī, jaham̐ taham̐ karahiṃ pukāra ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0