कोट कँगूरन्हि सोहहिं कैसे । मेरु के सृंगनि जनु घन बैसे ॥
बाजहिँ ढोल निसान जुझाऊ । सुनि धुनि होइ भटन्हि मन चाऊ ॥
koṭa kam̐gūranhi sohahiṃ kaise | meru ke sṛṃgani janu ghana baise ||
bājahim̐ ḍhola nisāna jujhāū | suni dhuni hoi bhaṭanhi mana cāū ||
6 श्लोक · 41 में से 121
परकोटे के कँगूरों पर राक्षस ऐसे शोभित हैं मानो मेरु के शिखरों पर बादल बैठे हों। जुझाऊ ढोल, नगाड़े, भेरी और नफीरी बजती हैं; उनकी ध्वनि सुनकर वीरों का मन उमगता है और कायरों के हृदय फटते हैं। विशाल शरीर वाले भालू और वानर ऊबड़-खाबड़ मार्ग की परवाह किए बिना दौड़ते हैं, पर्वत फोड़कर रास्ता बनाते, दाँत कटकटाते और करोड़ों की संख्या में गरजते हैं। उधर रावण की दुहाई, इधर राम की, जय-जयकार के साथ लड़ाई छिड़ जाती है। राक्षस शिखर ढहाते हैं, वानर कूदकर उन्हें पकड़ते और लौटा देते हैं। छन्द में भालू पर्वत-खण्ड गढ़ पर फेंकते, राक्षसों के पैर पकड़कर पटकते और महलों पर चढ़कर राम का यश गाते हैं। एक-एक वानर एक-एक राक्षस को पकड़कर कूदता है, स्वयं ऊपर और शत्रु नीचे धरती पर गिरता है।
कोट कँगूरन्हि सोहहिं कैसे । मेरु के सृंगनि जनु घन बैसे ॥
बाजहिँ ढोल निसान जुझाऊ । सुनि धुनि होइ भटन्हि मन चाऊ ॥
koṭa kam̐gūranhi sohahiṃ kaise | meru ke sṛṃgani janu ghana baise ||
bājahim̐ ḍhola nisāna jujhāū | suni dhuni hoi bhaṭanhi mana cāū ||
बाजहिँ भेरि नफीरि अपारा । सुनि कादर उर जाहिँ दरारा ॥
देखि न जाइ कपिन्ह के ठट्टा । अति-बिसाल-तनु भालु सुभट्टा ॥
bājahim̐ bheri naphīri apārā | suni kādara ura jāhim̐ darārā ||
dekhi na jāi kapinha ke ṭhaṭṭā | ati-bisāla-tanu bhālu subhaṭṭā ||
धावहिं गनहिँ न अवघट घाटा । पर्वत फोरि करहिं गहि बाटा ॥
कटकटाहिँ कोटिन्ह भट गर्जहिँ । दसन ओठ काटहिं अति तर्जहिँ ॥
dhāvahiṃ ganahim̐ na avaghaṭa ghāṭā | parvata phori karahiṃ gahi bāṭā ||
kaṭakaṭāhim̐ koṭinha bhaṭa garjahim̐ | dasana oṭha kāṭahiṃ ati tarjahim̐ ||
उत रावन इत राम दोहाई । जयति जयति जय परी लराई ॥
निसिचर सिखर समूह, ढहावहिँ । कूदि धरहिँ कपि फेरि चलावहिं ॥
uta rāvana ita rāma dohāī | jayati jayati jaya parī larāī ||
nisicara sikhara samūha, ḍhahāvahim̐ | kūdi dharahim̐ kapi pheri calāvahiṃ ||
धरि कुधर खंड प्रचंड कर्कट भालु गढ़ पर डारहीं ।
झपटहिं चरन गहि पटकि महि भजि, चलत बहुरि पचारहीं ॥
अति-तरल तरुन-प्रताप तरपहिं, तमकि गढ़ चढ़ि चढ़ि गये ।
कपि भालु चढ़ि मंदिरन्ह जहँ तहँ, राम-जस गावत भये ॥
dhari kudhara khaṃḍa pracaṃḍa karkaṭa bhālu gar̤ha para ḍārahīṃ |
jhapaṭahiṃ carana gahi paṭaki mahi bhaji, calata bahuri pacārahīṃ ||
ati-tarala taruna-pratāpa tarapahiṃ, tamaki gar̤ha car̤hi car̤hi gaye |
kapi bhālu car̤hi maṃdiranha jaham̐ taham̐, rāma-jasa gāvata bhaye ||
एक एक निसिचर गहि पुनि कपि चले पराइ ।
ऊपर आप हेठ भट, गिरहिं धरनि पर आइ ॥
eka eka nisicara gahi puni kapi cale parāi |
ūpara āpa heṭha bhaṭa, girahiṃ dharani para āi ||
पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0