लंकाकाण्ड

अध्याय 41: लंका के परकोटे पर आक्रमण आरम्भ

6 श्लोक · 41 में से 121

इस अध्याय में क्या होता है

लंका के परकोटे पर आक्रमण आरम्भ

परकोटे के कँगूरों पर राक्षस ऐसे शोभित हैं मानो मेरु के शिखरों पर बादल बैठे हों। जुझाऊ ढोल, नगाड़े, भेरी और नफीरी बजती हैं; उनकी ध्वनि सुनकर वीरों का मन उमगता है और कायरों के हृदय फटते हैं। विशाल शरीर वाले भालू और वानर ऊबड़-खाबड़ मार्ग की परवाह किए बिना दौड़ते हैं, पर्वत फोड़कर रास्ता बनाते, दाँत कटकटाते और करोड़ों की संख्या में गरजते हैं। उधर रावण की दुहाई, इधर राम की, जय-जयकार के साथ लड़ाई छिड़ जाती है। राक्षस शिखर ढहाते हैं, वानर कूदकर उन्हें पकड़ते और लौटा देते हैं। छन्द में भालू पर्वत-खण्ड गढ़ पर फेंकते, राक्षसों के पैर पकड़कर पटकते और महलों पर चढ़कर राम का यश गाते हैं। एक-एक वानर एक-एक राक्षस को पकड़कर कूदता है, स्वयं ऊपर और शत्रु नीचे धरती पर गिरता है।

41.1

कोट कँगूरन्हि सोहहिं कैसे । मेरु के सृंगनि जनु घन बैसे ॥
बाजहिँ ढोल निसान जुझाऊ । सुनि धुनि होइ भटन्हि मन चाऊ ॥

koṭa kam̐gūranhi sohahiṃ kaise | meru ke sṛṃgani janu ghana baise ||
bājahim̐ ḍhola nisāna jujhāū | suni dhuni hoi bhaṭanhi mana cāū ||

41.2

बाजहिँ भेरि नफीरि अपारा । सुनि कादर उर जाहिँ दरारा ॥
देखि न जाइ कपिन्ह के ठट्टा । अति-बिसाल-तनु भालु सुभट्टा ॥

bājahim̐ bheri naphīri apārā | suni kādara ura jāhim̐ darārā ||
dekhi na jāi kapinha ke ṭhaṭṭā | ati-bisāla-tanu bhālu subhaṭṭā ||

41.3

धावहिं गनहिँ न अवघट घाटा । पर्वत फोरि करहिं गहि बाटा ॥
कटकटाहिँ कोटिन्ह भट गर्जहिँ । दसन ओठ काटहिं अति तर्जहिँ ॥

dhāvahiṃ ganahim̐ na avaghaṭa ghāṭā | parvata phori karahiṃ gahi bāṭā ||
kaṭakaṭāhim̐ koṭinha bhaṭa garjahim̐ | dasana oṭha kāṭahiṃ ati tarjahim̐ ||

41.4

उत रावन इत राम दोहाई । जयति जयति जय परी लराई ॥
निसिचर सिखर समूह, ढहावहिँ । कूदि धरहिँ कपि फेरि चलावहिं ॥

uta rāvana ita rāma dohāī | jayati jayati jaya parī larāī ||
nisicara sikhara samūha, ḍhahāvahim̐ | kūdi dharahim̐ kapi pheri calāvahiṃ ||

41.छं॰ 1छन्द

धरि कुधर खंड प्रचंड कर्कट भालु गढ़ पर डारहीं ।
झपटहिं चरन गहि पटकि महि भजि, चलत बहुरि पचारहीं ॥
अति-तरल तरुन-प्रताप तरपहिं, तमकि गढ़ चढ़ि चढ़ि गये ।
कपि भालु चढ़ि मंदिरन्ह जहँ तहँ, राम-जस गावत भये ॥

dhari kudhara khaṃḍa pracaṃḍa karkaṭa bhālu gar̤ha para ḍārahīṃ |
jhapaṭahiṃ carana gahi paṭaki mahi bhaji, calata bahuri pacārahīṃ ||
ati-tarala taruna-pratāpa tarapahiṃ, tamaki gar̤ha car̤hi car̤hi gaye |
kapi bhālu car̤hi maṃdiranha jaham̐ taham̐, rāma-jasa gāvata bhaye ||

दो॰ 41दोहा

एक एक निसिचर गहि पुनि कपि चले पराइ ।
ऊपर आप हेठ भट, गिरहिं धरनि पर आइ ॥

eka eka nisicara gahi puni kapi cale parāi |
ūpara āpa heṭha bhaṭa, girahiṃ dharani para āi ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0