मैं तव दसन तोरिबे लायक । आयसु मोहि न दीन्ह रघुनायक ॥
अस रिस होत दसउ मुख तोरौं । लङ्का गहि समुद्र महँ बोरौं ॥
maiṃ tava dasana toribe lāyaka | āyasu mohi na dīnha raghunāyaka ||
asa risa hota dasau mukha torauṃ | laṅkā gahi samudra maham̐ borauṃ ||
9 श्लोक · 34 में से 121
अंगद कहते हैं: मैं तेरे दाँत तोड़ सकता हूँ, पर रघुनायक ने आज्ञा नहीं दी; लंका गूलर का फल है और तुम उसके भीतर के कीड़े, इसे समुद्र में डुबो दूँ। रावण मुस्कराता है: बालि ने कभी ऐसी डींग नहीं मारी, तू तपस्वियों से मिलकर झूठा हो गया। अंगद कहते हैं: तेरी दसों जीभें न उखाड़ूँ तो झूठा हूँ। राम के प्रताप का स्मरण कर वे सभा में प्रण करके पैर जमाते हैं: यदि मेरा पैर हटा सके तो राम लौट जाएँगे और मैं सीता को हार गया। रावण योद्धाओं से पैर पकड़ने को कहता है। मेघनाद आदि करोड़ों वीर पूरा बल लगाते हैं, पर पैर नहीं टलता; वे सिर नवाकर बैठ जाते हैं, जैसे कुयोगी मोह का वृक्ष नहीं उखाड़ पाता।
मैं तव दसन तोरिबे लायक । आयसु मोहि न दीन्ह रघुनायक ॥
अस रिस होत दसउ मुख तोरौं । लङ्का गहि समुद्र महँ बोरौं ॥
maiṃ tava dasana toribe lāyaka | āyasu mohi na dīnha raghunāyaka ||
asa risa hota dasau mukha torauṃ | laṅkā gahi samudra maham̐ borauṃ ||
गूलरि-फल-समान तन लङ्का । बसहु मध्य तुम्ह जन्तु असङ्का ॥
मैं बानर फल खात न बारा । आयसु दीन्ह न राम उदारा ॥
gūlari-phala-samāna tana laṅkā | basahu madhya tumha jantu asaṅkā ||
maiṃ bānara phala khāta na bārā | āyasu dīnha na rāma udārā ||
जुगुति सुनत रावन मुसुकाई । मूढ़ लिखे कहँ बहुत झुठाई ॥
बालि न कबहुँ गाल अस मारा । मिलि तपसिन्ह तैं भएसि लवारा ॥
juguti sunata rāvana musukāī | mūr̤ha likhe kaham̐ bahuta jhuṭhāī ||
bāli na kabahum̐ gāla asa mārā | mili tapasinha taiṃ bhaesi lavārā ||
साँचेहु मैं लबार भुज बीहा । जौँ न उपारिउँ तव दस-जीहा ॥
समुझि राम प्रताप कपि कोपा । सभा माझ पन करि पद रोपा ॥
sām̐cehu maiṃ labāra bhuja bīhā | jaum̐ na upārium̐ tava dasa-jīhā ||
samujhi rāma pratāpa kapi kopā | sabhā mājha pana kari pada ropā ||
जौँ मल चरन सकसि सठ टारी । फिरहिं राम सीता मैं हारी ॥
सुनहु सुभट सब कह दससीसा । पद गहि धरनि पछारहु कीसा ॥
jaum̐ mala carana sakasi saṭha ṭārī | phirahiṃ rāma sītā maiṃ hārī ||
sunahu subhaṭa saba kaha dasasīsā | pada gahi dharani pachārahu kīsā ||
इन्द्रजीत आदिक बलवाना । हरषि उठे जहँ तहँ भट नाना ॥
झपटहिँ करि बल बिपुल उपाई । पद न टरइ बैठहिँ सिर नाई ॥
indrajīta ādika balavānā | haraṣi uṭhe jaham̐ taham̐ bhaṭa nānā ||
jhapaṭahim̐ kari bala bipula upāī | pada na ṭarai baiṭhahim̐ sira nāī ||
पुनि उठि झपटहिँ सुर आराती । टरइ न कीस चरन एहि भाँती ॥
पुरुष-कुजोगी जिमि उरगारी । मोह-बिटप नहिँ सकहिं उपारी ॥
puni uṭhi jhapaṭahim̐ sura ārātī | ṭarai na kīsa carana ehi bhām̐tī ||
puruṣa-kujogī jimi uragārī | moha-biṭapa nahim̐ sakahiṃ upārī ||
कोटिन्ह मेघनाद सम, सुभट उठे हरषाइ ।
झपटहिँ टरै न कपि-चरन, पुनि बैठहिँ सिर नाइ ॥
koṭinha meghanāda sama, subhaṭa uṭhe haraṣāi |
jhapaṭahim̐ ṭarai na kapi-carana, puni baiṭhahim̐ sira nāi ||
भूमि न छाँडत कपि-चरन, देखत रिपु-मद-भाग ।
कोटि चित्र ते सन्त कर, मन जिमि नीति न त्याग ॥
bhūmi na chām̐ḍata kapi-carana, dekhata ripu-mada-bhāga |
koṭi citra te santa kara, mana jimi nīti na tyāga ||
पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0