लंकाकाण्ड

अध्याय 35: रावण झुका, अंगद राम के पास लौटे

9 श्लोक · 35 में से 121

इस अध्याय में क्या होता है

रावण झुका, अंगद राम के पास लौटे

सब हृदय में हार गए। तब रावण स्वयं उठकर पैर पकड़ता है। अंगद कहते हैं: मेरे पैर पकड़ने से उद्धार नहीं, रे दुष्ट, जाकर राम के चरण पकड़। सकुचाकर रावण लौट जाता है, उसका तेज ऐसे चला गया जैसे दोपहर में चन्द्रमा; वह सिर झुकाकर सिंहासन पर ऐसे बैठा मानो सब कुछ गँवा दिया हो। शिव उमा से कहते हैं: जिन राम की भौंह के इशारे से विश्व बनता और मिटता है, उनके दूत का प्रण कैसे टले? अंगद ने बहुत नीति कही, पर काल निकट होने से रावण ने नहीं मानी। अभी नहीं, रण में मारूँगा, कहकर अंगद चल देते हैं। पुलकित शरीर और सजल नेत्रों से वे राम के चरण पकड़ते हैं। साँझ को मंदोदरी फिर रावण को समझाती है।

35.1

कपि-बल-देखि सकल हियँ हारे । उठा आपु कपि कें परचारे ॥
गहत चरन कह बालिकुमारा । सम-पद-गहें न तोर उबारा ॥

kapi-bala-dekhi sakala hiyam̐ hāre | uṭhā āpu kapi keṃ paracāre ||
gahata carana kaha bālikumārā | sama-pada-gaheṃ na tora ubārā ||

35.2

गहसि न राम-चरन सठ जाई । सुनत फिरा मन अति-सकुचाई ॥
भयउ तेज-हत श्री सब गई । मध्य-दिवस जिमि ससि सोहई ॥

gahasi na rāma-carana saṭha jāī | sunata phirā mana ati-sakucāī ||
bhayau teja-hata śrī saba gaī | madhya-divasa jimi sasi sohaī ||

35.3

सिंहासन बैठेउ सिर लाई । मानहुँ सम्पति सकल गंवाई ॥
जगदातमा-प्रानपति-रामा । तासु बिमुख किमि लह बिश्रामा ॥

siṃhāsana baiṭheu sira lāī | mānahum̐ sampati sakala gaṃvāī ||
jagadātamā-prānapati-rāmā | tāsu bimukha kimi laha biśrāmā ||

35.4

उमा राम की भृकुटि-बिलासा । होइ बिस्व पुनि पावइ नासा ॥
तृन ते कुलिस कुलिस तृन करई । तासु दूत पन कहु किमि टरई ॥

umā rāma kī bhṛkuṭi-bilāsā | hoi bisva puni pāvai nāsā ||
tṛna te kulisa kulisa tṛna karaī | tāsu dūta pana kahu kimi ṭaraī ||

35.5

पुनि कपि कही नीति विधि नाना । मान न तासु काल निअराना ॥
रिपु-मद-मथि-प्रभु-सुजस सुनायो । यह कहि चलेउ बालि-नृप-जायो ॥

puni kapi kahī nīti vidhi nānā | māna na tāsu kāla niarānā ||
ripu-mada-mathi-prabhu-sujasa sunāyo | yaha kahi caleu bāli-nṛpa-jāyo ||

35.6

हतौं न खेत खेलाइ खेलाई । तोहि अबहिँ का करउँ बड़ाई ॥
प्रथमहिँ तासु तनय कपि मारा । सो सुनि रावन भयउ दुखारा ॥

hatauṃ na kheta khelāi khelāī | tohi abahim̐ kā karaum̐ bar̤āī ||
prathamahim̐ tāsu tanaya kapi mārā | so suni rāvana bhayau dukhārā ||

35.7

जातुधान अङ्गद पन देखी । भय ब्याकुल सब भये बिसेखी ॥

jātudhāna aṅgada pana dekhī | bhaya byākula saba bhaye bisekhī ||

दो॰ 35 (क)दोहा

रिपु-बल-धरषि हरषि कपि, बालि-तनय बल-पुञ्ज ।
पुलक सरीर नयन जल, गहे राम-पद-कञ्ज ॥

ripu-bala-dharaṣi haraṣi kapi, bāli-tanaya bala-puñja |
pulaka sarīra nayana jala, gahe rāma-pada-kañja ||

दो॰ 35 (ख)दोहा

साँझ जानि दसकन्धर, भवन गयउ बिलखाइ ।
मन्दोदरी रावनहि, बहुरि कहा समुझाइ ॥

sām̐jha jāni dasakandhara, bhavana gayau bilakhāi |
mandodarī rāvanahi, bahuri kahā samujhāi ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0