लंकाकाण्ड

अध्याय 23: रावण राम की सेना को तुच्छ बताता है

11 श्लोक · 23 में से 121

इस अध्याय में क्या होता है

रावण राम की सेना को तुच्छ बताता है

रावण तिरस्कार से कहता है: तेरी सेना में मुझसे कौन लड़ेगा? तेरा स्वामी स्त्री के विरह में बलहीन है, भाई उसी दुख से दुखी; तू और सुग्रीव नदी किनारे के पेड़ हो, मेरा भाई डरपोक, जाम्बवान बूढ़ा, नल-नील केवल शिल्पी। एक ही वानर बली है, जिसने नगर जलाया। अंगद हँसते हैं: एक छोटे बन्दर ने रावण का नगर जलाया? यह कौन मानेगा? वह सुग्रीव का छोटा धावक है, खबर लेने भेजा था, बिना आज्ञा नगर जलाकर डर से छिपा रहा। हमारी सेना में कोई तुमसे लड़ने योग्य नहीं; वैर बराबर वालों से होता है, मेंढक मारकर सिंह की प्रशंसा कौन करे? फिर भी क्षत्रिय का क्रोध कठोर होता है। तिलमिलाकर रावण हँसता है: बन्दर में एक गुण है, वह स्वामी के लिए बहुत उपाय करता है।

23.1

तुम्हरे कटक माझ सुनु अङ्गद । मो सन भिरिहि कवन जोधा बद ॥
तव प्रभु नारि-बिरहँ बल-हीना । अनुज तासु दुख दुखी मलीना ॥

tumhare kaṭaka mājha sunu aṅgada | mo sana bhirihi kavana jodhā bada ||
tava prabhu nāri-biraham̐ bala-hīnā | anuja tāsu dukha dukhī malīnā ||

23.2

तुम्ह सुग्रीव कूल-द्रुम दोऊ । अनुज हमार भीरु अति सोऊ ॥
जामवन्त मन्त्री अति बूढ़ा । सो कि होइ अब समरारूढ़ा ॥

tumha sugrīva kūla-druma doū | anuja hamāra bhīru ati soū ||
jāmavanta mantrī ati būr̤hā | so ki hoi aba samarārūr̤hā ||

23.3

सिल्पि-कर्म जानहिँ नल-नीला । है कपि एक महा-बल-सीला ॥
आवा प्रथम नगर जेंहिं जारा । सुनि हँसि बोलेउ बालिकुमारा ॥

silpi-karma jānahim̐ nala-nīlā | hai kapi eka mahā-bala-sīlā ||
āvā prathama nagara jeṃhiṃ jārā | suni ham̐si boleu bālikumārā ||

23.4

सत्य बचन कहु निसिचर-नाहा । साँचेहु कीस कीन्ह पुर-दाहा ॥
रावन नगर अलप कपि दहई । सुनि अस बचन सत्य को कहई ॥

satya bacana kahu nisicara-nāhā | sām̐cehu kīsa kīnha pura-dāhā ||
rāvana nagara alapa kapi dahaī | suni asa bacana satya ko kahaī ||

23.5

जो अति-सुभट सराहेहु रावन । सो सुग्रीव केर लघु-धावन ॥
चलइ बहुत सो बीर न होई । पठवा खबरि लेन हम सोई ॥

jo ati-subhaṭa sarāhehu rāvana | so sugrīva kera laghu-dhāvana ||
calai bahuta so bīra na hoī | paṭhavā khabari lena hama soī ||

दो॰ 23 (क)दोहा

सत्य नगर कपि जारेउ, बिनु प्रभु आयसु पाइ ।
फिरि न गयउ सुग्रीव पहिँ, तेहिं भय रहा लुकाइ ॥

satya nagara kapi jāreu, binu prabhu āyasu pāi |
phiri na gayau sugrīva pahim̐, tehiṃ bhaya rahā lukāi ||

दो॰ 23 (ख)दोहा

सत्य कहहि दसकंठ सब, मोहि न सुनि कछु कोह ।
कोउ न हमारें कटक अस, तो सन लरत जो सोह ॥

satya kahahi dasakaṃṭha saba, mohi na suni kachu koha |
kou na hamāreṃ kaṭaka asa, to sana larata jo soha ||

दो॰ 23 (ग)दोहा

प्रीति बिरोध समान सन, करिय नीति असि आहि ।
जौँ मृगपति बध मेड़ुकन्हि, अल कि कहइ कोउ ताहि ॥

prīti birodha samāna sana, kariya nīti asi āhi |
jaum̐ mṛgapati badha mer̤ukanhi, ala ki kahai kou tāhi ||

दो॰ 23 (घ)दोहा

जदपि लघुता राम कहूँ, तोहि बधें बड़ दोष ।
तदपि कठिन दसकंठ सुनु, छत्र जाति कर रोष ॥

jadapi laghutā rāma kahūm̐, tohi badheṃ bar̤a doṣa |
tadapi kaṭhina dasakaṃṭha sunu, chatra jāti kara roṣa ||

दो॰ 23 (ङ)दोहा

बक्र-उक्ति धनु बचन-सर, हृदय दहेउ रिपु कीस ।
प्रतिउत्तर सड़सिन्ह मनहुँ, काढ़त भट दससीस ॥

bakra-ukti dhanu bacana-sara, hṛdaya daheu ripu kīsa |
pratiuttara sar̤asinha manahum̐, kār̤hata bhaṭa dasasīsa ||

दो॰ 23 (छ)दोहा

हँसि बोलेउ दसमौलि तब, कपि कर बड़ गुन एक ।
जो प्रतिपालइ तासु हित, करइ उपाय अनेक ॥

ham̐si boleu dasamauli taba, kapi kara bar̤a guna eka |
jo pratipālai tāsu hita, karai upāya aneka ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0