लंकाकाण्ड

अध्याय 22: अंगद का रावण के धर्म पर व्यंग्य

6 श्लोक · 22 में से 121

इस अध्याय में क्या होता है

अंगद का रावण के धर्म पर व्यंग्य

अंगद कहते हैं: शिव, ब्रह्मा और मुनि जिनके चरणों की सेवा चाहते हैं, उनका दूत बनकर मैंने कुल डुबो दिया? आँखें तरेरकर रावण कहता है: दुष्ट, मैं तेरे कठोर वचन इसलिए सहता हूँ कि नीति और धर्म जानता हूँ। अंगद कहते हैं: तुम्हारी धर्मशीलता हमने सुनी है, तुम पराई स्त्री चुराते हो; दूत की रखवाली भी आँखों से देखी। बहन को बिना नाक-कान के देखकर तुमने धर्म विचारकर क्षमा कर दिया! हम बड़भागी हैं जो ऐसे धर्म के दर्शन पाए। रावण कहता है: रे जड़ बन्दर, बकवास मत कर, मेरी भुजाएँ देख। लोकपालों का बल चन्द्रमा है और ये भुजाएँ राहु; इन्हीं हाथों पर शम्भु सहित कैलास कमलों पर हंस की तरह शोभित हुआ था।

22.1

सिव-बिरञ्चि-सुर-मुनि-समुदाई । चाहत जासु चरन-सेवकाई ॥
तासु दूत होइ हम कुल बोरा । अइसिहुँ मति उर बिहर न तोरा ॥

siva-birañci-sura-muni-samudāī | cāhata jāsu carana-sevakāī ||
tāsu dūta hoi hama kula borā | aisihum̐ mati ura bihara na torā ||

22.2

सुनि कठोर बानी कपि केरी । कहत दसानन नयन तरेरी ॥
खल तव कठिन बचन सब सहऊँ । नीति धरम मैं जानत अहऊँ ॥

suni kaṭhora bānī kapi kerī | kahata dasānana nayana tarerī ||
khala tava kaṭhina bacana saba sahaūm̐ | nīti dharama maiṃ jānata ahaūm̐ ||

22.3

कह कपि धर्मसीलता तोरी । हमहुँ सुनी कृत पर-त्रिय-चोरी ॥
देखी नयन दूत रखवारी । बूडि न मरहु धर्म ब्रतधारी ॥

kaha kapi dharmasīlatā torī | hamahum̐ sunī kṛta para-triya-corī ||
dekhī nayana dūta rakhavārī | būḍi na marahu dharma bratadhārī ||

22.4

कान नाक बिनु भगिनि निहारी । छमा कीन्हि तुम्ह धरम बिचारी ॥
धर्मसीलता तब जग जागी । पावा दरस हमहुँ बड़ भागी ॥

kāna nāka binu bhagini nihārī | chamā kīnhi tumha dharama bicārī ||
dharmasīlatā taba jaga jāgī | pāvā darasa hamahum̐ bar̤a bhāgī ||

दो॰ 22 (क)दोहा

जनि जल्पसि जड़ जन्तु कपि, सठ बिलोकु मम बाहु ।
लोकपाल बल बिपुल ससि, ग्रसन हेतु सब राहु ॥

jani jalpasi jar̤a jantu kapi, saṭha biloku mama bāhu |
lokapāla bala bipula sasi, grasana hetu saba rāhu ||

दो॰ 22 (ख)दोहा

पुनि नभ-सर मम-कर-निकर, कमलन्हि पर करि बास ।
सोभत भयउ मराल इव, सम्भु सहित कैलास ॥

puni nabha-sara mama-kara-nikara, kamalanhi para kari bāsa |
sobhata bhayau marāla iva, sambhu sahita kailāsa ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0