धन्य कीस जो निज-प्रभु-काजा । जहँ तहँ नाचइ परिहरि लाजा ॥
नाचि कूदि करि लोग रिझाई । पति-हित करइ धरम निपुनाई ॥
dhanya kīsa jo nija-prabhu-kājā | jaham̐ taham̐ nācai parihari lājā ||
nāci kūdi kari loga rijhāī | pati-hita karai dharama nipunāī ||
9 श्लोक · 24 में से 121
रावण कहता है: धन्य है वह बन्दर जो स्वामी के लिए लाज छोड़कर नाचता है। अंगद, तेरी जाति स्वामिभक्त है; मैं गुणग्राहक हूँ, तेरी कड़वी बातों पर कान नहीं देता। अंगद कहते हैं: तुम्हारी गुणग्राहकता हनुमान ने सुनाई थी। उसने वन उजाड़ा, पुत्र मारा, नगर जलाया, फिर भी तुमने उसका कुछ नहीं बिगाड़ा। रावण हँसता है: ऐसी बुद्धि थी तो तू बाप को खा गया होता! अंगद कहते हैं: फिर तुम्हें भी खाता, पर बालि के यश के लिए नहीं मारता। बताओ, कितने रावण हैं? एक बलि को जीतने पाताल गया और बच्चों ने उसे घुड़साल में बाँधकर मारा। एक को सहस्रबाहु ने जन्तु की तरह पकड़ा। एक बालि की काँख में रहा। तुम इनमें कौन-से हो?
धन्य कीस जो निज-प्रभु-काजा । जहँ तहँ नाचइ परिहरि लाजा ॥
नाचि कूदि करि लोग रिझाई । पति-हित करइ धरम निपुनाई ॥
dhanya kīsa jo nija-prabhu-kājā | jaham̐ taham̐ nācai parihari lājā ||
nāci kūdi kari loga rijhāī | pati-hita karai dharama nipunāī ||
अङ्गद स्वामिभक्त तव जाती । प्रभु गुन कस न कहसि एहि आँतो ॥
मैं गुन-गाहक परम-सुजाना । तब कटु रटनि करउँ नहिँ काना ॥
aṅgada svāmibhakta tava jātī | prabhu guna kasa na kahasi ehi ām̐to ||
maiṃ guna-gāhaka parama-sujānā | taba kaṭu raṭani karaum̐ nahim̐ kānā ||
कह कपि तब गुन-गाहकताई । सत्य पवनसुत मोहि सुनाई ॥
बन-बिधंसि सुत-बधि पुर-जारा । तदपि न तेहिं कछु कृत अपकारा ॥
kaha kapi taba guna-gāhakatāī | satya pavanasuta mohi sunāī ||
bana-bidhaṃsi suta-badhi pura-jārā | tadapi na tehiṃ kachu kṛta apakārā ||
सोइ बिचारि तव प्रकृति सुहाई । दसकन्धर मैं कीन्हि ढिठाई ॥
देखेउँ आइ जो कछु कपि भाषा । तुम्हरें लाज न रोष न माषा ॥
soi bicāri tava prakṛti suhāī | dasakandhara maiṃ kīnhi ḍhiṭhāī ||
dekheum̐ āi jo kachu kapi bhāṣā | tumhareṃ lāja na roṣa na māṣā ||
जौं असि मति पितु खाए कीसा । कहि अस बचन हँसा दस सीसा ॥
पितहि खाइ खातेउँ पुनि तोही । अबहीं समुझि परा कछु मोही ॥
jauṃ asi mati pitu khāe kīsā | kahi asa bacana ham̐sā dasa sīsā ||
pitahi khāi khāteum̐ puni tohī | abahīṃ samujhi parā kachu mohī ||
बालि-बिमल-जस-भाजन जानी । हतउँ न तोहि अधम अभिमानी ॥
कहु रावन रावन जग केते । मैं निज श्रवन सुने सुनु जेते ॥
bāli-bimala-jasa-bhājana jānī | hataum̐ na tohi adhama abhimānī ||
kahu rāvana rāvana jaga kete | maiṃ nija śravana sune sunu jete ||
बलिहि जितन एक गयउ पताला । राखेउ बाँधि सिसुन्ह हयसाला ॥
खेलहिँ बालक मारहिं जाई । दया लागि बलि दीन्ह छोड़ाई ॥
balihi jitana eka gayau patālā | rākheu bām̐dhi sisunha hayasālā ||
khelahim̐ bālaka mārahiṃ jāī | dayā lāgi bali dīnha chor̤āī ||
एक बहोरि सहसभुज देखा । धाइ धरा जिमि जन्तु बिसेखा ॥
कौतुक लागि भवन लेइ आवा । सो पुलस्ति मुनि जाइ छोड़ावा ॥
eka bahori sahasabhuja dekhā | dhāi dharā jimi jantu bisekhā ||
kautuka lāgi bhavana lei āvā | so pulasti muni jāi chor̤āvā ||
एक कहत मोहि सकुच अति, रहा बालि की काँख ।
इन्ह मह रावन ते कवन, सत्य बदहि तजि माख ॥
eka kahata mohi sakuca ati, rahā bāli kī kām̐kha |
inha maha rāvana te kavana, satya badahi taji mākha ||
पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0