लंकाकाण्ड

अध्याय 18: अंगद लंका में प्रवेश कर रावणपुत्र को मारते हैं

6 श्लोक · 18 में से 121

इस अध्याय में क्या होता है

अंगद लंका में प्रवेश कर रावणपुत्र को मारते हैं

सबको सिर नवाकर, प्रभु का प्रताप हृदय में धरकर सहज निर्भय अंगद चल पड़ते हैं। लंका में प्रवेश करते ही खेलते हुए रावण के एक पुत्र से भेंट होती है। बात-बात में झगड़ा बढ़ जाता है, दोनों युवा और अतुल बलवान हैं। उसने अंगद पर लात उठाई, अंगद ने पैर पकड़कर उसे घुमाकर धरती पर पटक दिया। राक्षस डर से भागते हैं, पुकार भी नहीं सकते, और उसके वध की बात आपस में छिपाए रहते हैं। नगर में कोलाहल मचता है कि लंका जलाने वाला वानर फिर आ गया। भयभीत लोग बिना पूछे उसे मार्ग दिखा देते हैं। राम के चरणों का स्मरण कर अंगद सभा के द्वार पहुँचकर सिंह की भाँति इधर-उधर देखते हैं।

18.1

बन्दि चरन उर धरि प्रभुताई । अङ्गद चलेउ सबहि सिर नाई ॥
प्रभु प्रताप उर सहज असङ्का । रन-बांकुरा बालि-सुत बङ्का ॥

bandi carana ura dhari prabhutāī | aṅgada caleu sabahi sira nāī ||
prabhu pratāpa ura sahaja asaṅkā | rana-bāṃkurā bāli-suta baṅkā ||

18.2

पुर पैठत रावन कर बेटा । खेलत रहा सो होइ गइ भैंटा ॥
बातहिं बात करष बढ़ि आई । जुगल-अतुल-बल पुनि तरुनाई ॥

pura paiṭhata rāvana kara beṭā | khelata rahā so hoi gai bhaiṃṭā ||
bātahiṃ bāta karaṣa bar̤hi āī | jugala-atula-bala puni tarunāī ||

18.3

तेहि अङ्गद कहुँ लात उठाई । गहि पद पटकेउ भूमि भवाँई ॥
निसिचर-निकर देखि भट भारी । जहँ तहँ चले न सकहिँ पुकारी ॥

tehi aṅgada kahum̐ lāta uṭhāī | gahi pada paṭakeu bhūmi bhavām̐ī ||
nisicara-nikara dekhi bhaṭa bhārī | jaham̐ taham̐ cale na sakahim̐ pukārī ||

18.4

एक एक सन मरम न कहहीँ । समुझि तासु बध चुप करि रहहीं ॥
भयउ कोलाहल नगर मझारी । आवा कपि लङ्का जेहि जारी ॥

eka eka sana marama na kahahīm̐ | samujhi tāsu badha cupa kari rahahīṃ ||
bhayau kolāhala nagara majhārī | āvā kapi laṅkā jehi jārī ||

18.5

अब धौँ काह करिहि करतारा । अति-सभीत सब करहिँ बिचारा ॥
बिनु पूछें मग देहिँ देखाई । जेहि बिलोक सोइ जाइ सुखाई ॥

aba dhaum̐ kāha karihi karatārā | ati-sabhīta saba karahim̐ bicārā ||
binu pūcheṃ maga dehim̐ dekhāī | jehi biloka soi jāi sukhāī ||

दो॰ 18दोहा

गयउ सभा दरबार तब, सुमिरि राम-पद-कञ्ज ।
सिंह-ठवनि इत उत चितव, धीर-बीर-बल-पुञ्ज ॥

gayau sabhā darabāra taba, sumiri rāma-pada-kañja |
siṃha-ṭhavani ita uta citava, dhīra-bīra-bala-puñja ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0