लंकाकाण्ड

अध्याय 14: अपशकुन, मंदोदरी की फिर विनती

5 श्लोक · 14 में से 121

इस अध्याय में क्या होता है

अपशकुन, मंदोदरी की फिर विनती

न धरती काँपी, न विशेष हवा चली, न आँखों से कोई अस्त्र दिखा, फिर भी मुकुट गिरे। सब मन में सोचते हैं कि बड़ा भयंकर अपशकुन हुआ है। सभा को भयभीत देखकर रावण हँसकर बात बनाता है: जिसके सिर गिरना सदा शुभ रहा, उसके मुकुट गिरने में अपशकुन कैसा? अपने-अपने घर जाकर सो जाओ। सब सिर नवाकर चले जाते हैं। जब से कुण्डल धरती पर गिरे, मंदोदरी के हृदय में चिन्ता बस गई है। आँखों में आँसू भरकर, दोनों हाथ जोड़कर वह कहती है: प्राणनाथ, मेरी विनती सुनिए। हे कन्त, राम से विरोध छोड़ दीजिए, उन्हें मनुष्य मानकर मन में हठ न कीजिए। मेरे वचन पर विश्वास कीजिए, रघुकुलमणि विश्वरूप हैं; वेद उनके अंग-अंग में लोकों की कल्पना करते हैं।

14.1

कम्प न भूमि न मरुत बिसेषा । अस्त्र सस्त्र कछु नयन न देखा ॥
सोचहिँ सब निज हृदय मझारी । असगुन भयउ भयङ्कर भारी ॥

kampa na bhūmi na maruta biseṣā | astra sastra kachu nayana na dekhā ||
socahim̐ saba nija hṛdaya majhārī | asaguna bhayau bhayaṅkara bhārī ||

14.2

दसमुख देखि सभा भय पाई । बिहसि बचन कह जुगुति बनाई ॥
सिरउ गिरे सन्तत सुभ जाही । मुकुट खसे कस असगुन ताही ॥

dasamukha dekhi sabhā bhaya pāī | bihasi bacana kaha juguti banāī ||
sirau gire santata subha jāhī | mukuṭa khase kasa asaguna tāhī ||

14.3

सयन करहु निज निज गृह जाई । गवने भवन चरन सिर नाई ॥
मन्दोदरी सोच उर बसेऊ । जब ते श्रवनपूर महि खसेऊ ॥

sayana karahu nija nija gṛha jāī | gavane bhavana carana sira nāī ||
mandodarī soca ura baseū | jaba te śravanapūra mahi khaseū ||

14.4

सजल-नयन कह जुग कर जोरी । सुनहु प्रानपति बिनती मोरी ॥
कन्त राम-बिरोध परिहरहू । जानि मनुज जनि हठ मन हठ धरहू ॥

sajala-nayana kaha juga kara jorī | sunahu prānapati binatī morī ||
kanta rāma-birodha pariharahū | jāni manuja jani haṭha mana haṭha dharahū ||

दो॰ 14दोहा

बिस्व-रूप रघु-बंस-मनि, करहु बचन विस्वासु ।
लोक कल्पना बेद कर, अङ्ग अङ्ग प्रति जासु ॥

bisva-rūpa raghu-baṃsa-mani, karahu bacana visvāsu |
loka kalpanā beda kara, aṅga aṅga prati jāsu ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0