लंकाकाण्ड

अध्याय 118: प्रभु का वानरों को घर लौटने को कहना

8 श्लोक · 118 में से 121

इस अध्याय में क्या होता है

प्रभु का वानरों को घर लौटने को कहना

भालू-वानर वस्त्र-आभूषण पहन-पहनकर रघुपति के पास आते हैं; उनकी तरह-तरह की सज-धज देखकर कोसलपति बार-बार हँसते हैं। प्रभु कोमल वचन कहते हैं: तुम्हारे बल से मैंने रावण को मारा और विभीषण का राजतिलक किया। अब सब अपने-अपने घर जाओ, मेरा स्मरण करना और किसी से मत डरना। प्रेम से व्याकुल वानर हाथ जोड़कर कहते हैं: प्रभु, आप त्रिलोक के स्वामी हैं, हम दीन वानरों को आपने सनाथ किया। आपके ऐसे वचन सुनकर हम लाज से मरे जाते हैं; क्या गरुड़ को मच्छर से सहायता चाहिए? प्रभु की प्रेरणा से वे राम-रूप हृदय में रखकर हर्ष और विषाद के साथ चलते हैं। सुग्रीव, जाम्बवान, अंगद, हनुमान, विभीषण आदि आँखें भरकर कुछ कह नहीं पाते, बिना पलक झपकाए राम को देखते रहते हैं।

118.1

भालु कपिन्ह पट भूषन पाये । पहिरि पहिरि रघुपति पहिँ आये ॥
नाना जिनस देखि सब कीसा । पुनि पुनि हँसत कोसलाधीसा ॥

bhālu kapinha paṭa bhūṣana pāye | pahiri pahiri raghupati pahim̐ āye ||
nānā jinasa dekhi saba kīsā | puni puni ham̐sata kosalādhīsā ||

118.2

चितइ सबन्हि पर कीन्ही दाया । बोले मृदुल बचन रघुराया ॥
तुम्हरें बल मैं रावन मार्यो । तिलक बिभीषन कहँ पुनि सार्यो ॥

citai sabanhi para kīnhī dāyā | bole mṛdula bacana raghurāyā ||
tumhareṃ bala maiṃ rāvana māryo | tilaka bibhīṣana kaham̐ puni sāryo ||

118.3

निज निज गृह अब तुम्ह सब जाहू । सुमिरेहु मोहि डरपहु जनि काहू ॥
सुनत बचन प्रेमाकुल बानर । जोरि पानि बोले सब सादर ॥

nija nija gṛha aba tumha saba jāhū | sumirehu mohi ḍarapahu jani kāhū ||
sunata bacana premākula bānara | jori pāni bole saba sādara ||

118.4

प्रभु जोइ कहहु तुम्हहिँ सब सोहा । हमरे होत बचन सुनि मोहा ॥
दीन जानि कपि किये सनाथा । तुम्ह त्रेलोक ईस रघुनाथा ॥

prabhu joi kahahu tumhahim̐ saba sohā | hamare hota bacana suni mohā ||
dīna jāni kapi kiye sanāthā | tumha treloka īsa raghunāthā ||

118.5

सुनि प्रभु बचन लाज हम मरहीं । मसक कहूँ खगपति हित करहीं ॥
देखि राम रुख बानर रीछा । प्रेम मगन नहिँ गृह के ईछा ॥

suni prabhu bacana lāja hama marahīṃ | masaka kahūm̐ khagapati hita karahīṃ ||
dekhi rāma rukha bānara rīchā | prema magana nahim̐ gṛha ke īchā ||

दो॰ 118 (क)दोहा

प्रभु प्रेरित कपि भालु सब, राम-रूप उर राखि ।
हरष बिषाद सहित चले, बिनय बिबिध बिधि भाषि ॥

prabhu prerita kapi bhālu saba, rāma-rūpa ura rākhi |
haraṣa biṣāda sahita cale, binaya bibidha bidhi bhāṣi ||

दो॰ 118 (ख)दोहा

कपिपति नील रीछपति, अङ्गद नल हनुमान ।
सहित बिभीषन अपर जे, जूथप कपि बलवान ॥

kapipati nīla rīchapati, aṅgada nala hanumāna |
sahita bibhīṣana apara je, jūthapa kapi balavāna ||

दो॰ 118 (ग)दोहा

कहि न कहि कछु प्रेम-बस, भरि भरि लोचन बारि ।
सनमुख चितवहिं राम तन, नयन निमेष निवारि ॥

kahi na kahi kachu prema-basa, bhari bhari locana bāri |
sanamukha citavahiṃ rāma tana, nayana nimeṣa nivāri ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0