लंकाकाण्ड

अध्याय 117: पुष्पक से वानरों पर रत्नों की वर्षा

6 श्लोक · 117 में से 121

इस अध्याय में क्या होता है

पुष्पक से वानरों पर रत्नों की वर्षा

श्रीराम के वचन सुनकर विभीषण हर्षित होकर कृपाधाम के चरण पकड़ लेते हैं, और वानर प्रसन्न होते हैं। फिर विभीषण महल जाकर पुष्पक विमान को मणियों और वस्त्रों से भरते हैं और उसे प्रभु के सामने रखते हैं। कृपासिन्धु हँसकर कहते हैं: सखा विभीषण, विमान पर चढ़कर आकाश में जाओ और वस्त्र-आभूषण बरसा दो। जिसे जो भाता है वह ले लेता है; कुछ वानर मणि मुँह में डालकर फिर थूक देते हैं। यह देखकर सीता और भाई सहित राम हँसते हैं। जिन्हें मुनि ध्यान में भी नहीं पाते, वेद जिन्हें नेति-नेति कहते हैं, वही कृपासिन्धु वानरों के साथ अनेक विनोद करते हैं। शिवजी उमा से कहते हैं: योग, जप, दान, तप, अनेक यज्ञ, व्रत और नियम से राम वैसी कृपा नहीं करते, जैसी निष्काम प्रेम से करते हैं।

117.1

सुनत बिभीषन बचन राम के । हरषि गहे पद कृपा धाम के ॥
बानर भालु सकल हरषाने । गहि प्रभु-पद गुन बिमल बखाने ॥

sunata bibhīṣana bacana rāma ke | haraṣi gahe pada kṛpā dhāma ke ||
bānara bhālu sakala haraṣāne | gahi prabhu-pada guna bimala bakhāne ||

117.2

बहुरि बिभीषन भवन सिधायो । मनि-गन-बसन बिमान भरायो ॥
लेइ पुष्पक प्रभु आगें राखा । हँसि करि कृपासिन्धु अरु भाषा ॥

bahuri bibhīṣana bhavana sidhāyo | mani-gana-basana bimāna bharāyo ||
lei puṣpaka prabhu āgeṃ rākhā | ham̐si kari kṛpāsindhu aru bhāṣā ||

117.3

चढ़ि बिमान सुनु सखा बिभीषन । गगन जाइ बरषहु पर भूषन ॥
नभ पर जाइ बिभीषन तबहीं । बरषि दिये मनि अम्बर सबहीं ॥

car̤hi bimāna sunu sakhā bibhīṣana | gagana jāi baraṣahu para bhūṣana ||
nabha para jāi bibhīṣana tabahīṃ | baraṣi diye mani ambara sabahīṃ ||

117.4

जोइ जोइ मन भावइ सोइ लेहीं । मनि मुख मेलि डारि कपि देहीं ॥
हँसे राम श्री-अनुज-समेता । परम कौतुकी कृपा निकेता ॥

joi joi mana bhāvai soi lehīṃ | mani mukha meli ḍāri kapi dehīṃ ||
ham̐se rāma śrī-anuja-sametā | parama kautukī kṛpā niketā ||

दो॰ 117 (क)दोहा

मुनि जेहि ध्यान न पावहिँ, नेति नेति कह बेद ।
कृपासिन्धु सोइ कपिन्ह सन, करत अनेक बिनोद ॥

muni jehi dhyāna na pāvahim̐, neti neti kaha beda |
kṛpāsindhu soi kapinha sana, karata aneka binoda ||

दो॰ 117 (ख)दोहा

उमा जोग जप दान तप, नाना मख ब्रत नेम ।
राम कृपा नहिँ करहिँ तसि, जसि निष्केवल प्रेम ॥

umā joga japa dāna tapa, nānā makha brata nema |
rāma kṛpā nahim̐ karahim̐ tasi, jasi niṣkevala prema ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0