लंकाकाण्ड

अध्याय 116: विभीषण की विनती, भरत के लिए प्रभु की व्याकुलता

8 श्लोक · 116 में से 121

इस अध्याय में क्या होता है

विभीषण की विनती, भरत के लिए प्रभु की व्याकुलता

शम्भु के जाने पर विभीषण कहते हैं: प्रभु, आपने रावण को मारा और मुझ नीच जाति वाले पर अनेक प्रकार से कृपा की। अब इस सेवक का घर पवित्र कीजिए, थकान मिटाइए, खजाना वानरों को दीजिए और मुझे साथ लेकर अयोध्या चलिए। सुनकर प्रभु के नेत्र सजल हो जाते हैं। वे कहते हैं: भाई, तुम्हारा खजाना और घर मेरा ही है। पर भरत की दशा स्मरण करते ही एक पल कल्प के समान बीतता है। तपस्वी वेष, दुबला शरीर, निरन्तर मेरा जप। सखा, ऐसा यत्न करो कि मैं उसे शीघ्र देखूँ; अवधि बीतने पर पहुँचा तो भाई को जीवित न पाऊँगा। फिर कहते हैं: कल्प भर राज्य करना, मन में मेरा स्मरण रखना, फिर मेरा धाम पाओगे, जहाँ सब सन्त जाते हैं।

116.1

करि बिनती जय सम्भु सिधाये । तब प्रभु निकट बिभीषन आये ॥
नाइ चरन सिर कह मृदु-बानी । बिनय सुनहु प्रभु सारंग पानी ॥

kari binatī jaya sambhu sidhāye | taba prabhu nikaṭa bibhīṣana āye ||
nāi carana sira kaha mṛdu-bānī | binaya sunahu prabhu sāraṃga pānī ||

116.2

सकुल सदल प्रभु रावन मार्यो । पावन-जस त्रिभुवन बिस्तार्यो ॥
दीन मलीन हीन-मति-जाती । जो पर कृपा कीन्हि बहु भाँती ॥

sakula sadala prabhu rāvana māryo | pāvana-jasa tribhuvana bistāryo ||
dīna malīna hīna-mati-jātī | jo para kṛpā kīnhi bahu bhām̐tī ||

116.3

अब जन गृह पुनीत प्रभु कीजै । मज्जनु करिय समर-श्रम छीजे ॥
देखि कोस मन्दिर सम्पदा । देहु कृपाल कपिन्ह कह मुदा ॥

aba jana gṛha punīta prabhu kījai | majjanu kariya samara-śrama chīje ||
dekhi kosa mandira sampadā | dehu kṛpāla kapinha kaha mudā ||

116.4

सब विधि नाथ मोहि अपनाइअ । पुनि मोहि सहित अवधपुर जाइअ ॥
सुनत बचन मृदु दीनदयाला । सजल भये दोउ नयन बिसाला ॥

saba vidhi nātha mohi apanāia | puni mohi sahita avadhapura jāia ||
sunata bacana mṛdu dīnadayālā | sajala bhaye dou nayana bisālā ||

दो॰ 116 (क)दोहा

तोर कोस-गृह मोर सब, सत्य बचन सुनु भ्रात ।
भरत दसा सुमिरत मोहि, निमिष कल्प सम जात ॥

tora kosa-gṛha mora saba, satya bacana sunu bhrāta |
bharata dasā sumirata mohi, nimiṣa kalpa sama jāta ||

दो॰ 116 (ख)दोहा

तापस बेष गात कृस, जपत निरन्तर मोहि ।
देखौं बेगि सो जतन करु, सखा निहोरउँ तोहि ॥

tāpasa beṣa gāta kṛsa, japata nirantara mohi |
dekhauṃ begi so jatana karu, sakhā nihoraum̐ tohi ||

दो॰ 116 (ग)दोहा

बीतें अवधि जाउँ जौँ, जियत न पावउँ बीर ।
सुमिरत अनुज प्रीति प्रभु, पुनि पुनि पुलक सरीर ॥

bīteṃ avadhi jāum̐ jaum̐, jiyata na pāvaum̐ bīra |
sumirata anuja prīti prabhu, puni puni pulaka sarīra ||

दो॰ 116 (घ)दोहा

करेहु कल्प भरि राम तुम्ह, मोहि सुमिरेहु मन माहिँ ।
पुनि मम धाम पाइहहु, जहाँ सन्त सब जाहिं ॥

karehu kalpa bhari rāma tumha, mohi sumirehu mana māhim̐ |
puni mama dhāma pāihahu, jahām̐ santa saba jāhiṃ ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0