लंकाकाण्ड

अध्याय 115: भगवान शिव की श्रीराम से विनती

4 श्लोक · 115 में से 121

इस अध्याय में क्या होता है

भगवान शिव की श्रीराम से विनती

प्रेम से गद्गद वाणी में त्रिपुरारि विनती करते हैं: हे रघुकुलनायक, मेरी रक्षा कीजिए। आप मोह के घने बादलों को उड़ाने वाली प्रचण्ड वायु, संशय के वन को जलाने वाली अग्नि हैं। निर्गुण भी, सगुण भी, गुणों के मन्दिर, आप भ्रम के अँधेरे को मिटाने वाले प्रतापी सूर्य हैं; भक्त के मन में सदा बसिए। विषय-कामनाओं के कमल-वन के लिए आप पाला हैं; इस कठिन भवसागर से पार कीजिए। हे श्याम शरीर, कमल-नयन, दीनबन्धु, शरणागत का दुख हरने वाले राजा राम, भाई और जानकी सहित मेरे हृदय में निरन्तर बसिए। अन्त में शिवजी कहते हैं: नाथ, जब कोसलपुरी में आपका राजतिलक होगा, मैं वह उदार चरित देखने आऊँगा।

115.छं॰ 1छन्द

मामभिरक्षय रघुकुल-नायक । धृत बर चाप रुचिर कर सायक ।
मोह-महा-घन-पटल प्रभंजन । संसय-बिपिन-अनल-सुर-रंजन ॥
अगुन सगुन गुन-मन्दिर सुन्दर । भ्रम-तम-प्रबल प्रताप-दिवाकर ।
काम-क्रोध-मद-गज पञ्चानन । बसहु निरन्तर जन-मन-कानन ॥

māmabhirakṣaya raghukula-nāyaka | dhṛta bara cāpa rucira kara sāyaka |
moha-mahā-ghana-paṭala prabhaṃjana | saṃsaya-bipina-anala-sura-raṃjana ||
aguna saguna guna-mandira sundara | bhrama-tama-prabala pratāpa-divākara |
kāma-krodha-mada-gaja pañcānana | basahu nirantara jana-mana-kānana ||

115.छं॰ 2छन्द

बिषय-मनोरथ पुञ्ज कञ्ज बन । प्रबल तुषार उदार पार मन ।
भव बारिधि मन्दर परमं दर । वारय तारय संसृति दुस्तर ॥
स्याम-गात राजीव बिलोचन । दीन बन्धु प्रनतारति-मोचन ।
अनुज जानकी सहित निरन्तर । बसहु राम-नृप मम उर अन्तर ॥

biṣaya-manoratha puñja kañja bana | prabala tuṣāra udāra pāra mana |
bhava bāridhi mandara paramaṃ dara | vāraya tāraya saṃsṛti dustara ||
syāma-gāta rājīva bilocana | dīna bandhu pranatārati-mocana |
anuja jānakī sahita nirantara | basahu rāma-nṛpa mama ura antara ||

115.छं॰ 3छन्द

मुनि-रञ्जन महि मंडल मंडन । तुलसिदास प्रभु त्रास-विखंडन ।

muni-rañjana mahi maṃḍala maṃḍana | tulasidāsa prabhu trāsa-vikhaṃḍana |

दो॰ 115दोहा

नाथ जबहिं कोसलपुरीं, होइहि तिलक तुम्हार ।
कृपासिन्धु मेँ आउब देखन चरित उदार ॥

nātha jabahiṃ kosalapurīṃ, hoihi tilaka tumhāra |
kṛpāsindhu mem̐ āuba dekhana carita udāra ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0