लंकाकाण्ड

अध्याय 113: इन्द्र की स्तुति और भक्ति की याचना

6 श्लोक · 113 में से 121

इस अध्याय में क्या होता है

इन्द्र की स्तुति और भक्ति की याचना

इन्द्र स्तुति करते हैं: जय हो राम की, जो शोभा के धाम हैं, खर-दूषण के शत्रु। हे नाथ, आपने इस दुष्ट को मारा, सब देवता फिर सनाथ हुए। बल के गर्व में लंकापति ने देवता, मुनि और मनुष्य सबको सताया; पर-द्रोह में रत उस पापी ने अपना फल पाया। हे कमल-नयन दीनदयाल, मुझे बड़ा अभिमान था कि मेरे समान कोई नहीं; आपके चरण-कमल देखकर वह अभिमान और उसके दुख मिट गए। कोई निर्गुण, अव्यक्त ब्रह्म का ध्यान करता है; मुझे तो कोसलराज, सगुण श्रीराम ही भाते हैं। वैदेही और भाई सहित मेरे हृदय में बसिए, मुझे अपना दास जानकर भक्ति दीजिए। अब कृपा करके आज्ञा दीजिए, मैं क्या करूँ।

113.छं॰ 1छन्द

जय राम सोभा-धाम । दायक प्रनत बिस्राम ।
धृत त्रोन बर सर चाप । भुजदंड प्रबल प्रताप ॥
जय दूषनारि खरारि । मर्दन-निसाचर-धारि ।
यह दुष्ट मारेउ नाथ । भये देव सकल सनाथ ॥

jaya rāma sobhā-dhāma | dāyaka pranata bisrāma |
dhṛta trona bara sara cāpa | bhujadaṃḍa prabala pratāpa ||
jaya dūṣanāri kharāri | mardana-nisācara-dhāri |
yaha duṣṭa māreu nātha | bhaye deva sakala sanātha ||

113.छं॰ 2छन्द

जय हरन धरनी भार । महिमा उदार अपार ।
जय रावनारि कृपाल । किए जातुधान बिहाल ॥
लंकेस अति बल गर्ब । किए बस्य सुर गंधर्ब ।
मुनि सिद्ध नर खग नाग । हठि पन्थ सब कें लाग ॥

jaya harana dharanī bhāra | mahimā udāra apāra |
jaya rāvanāri kṛpāla | kie jātudhāna bihāla ||
laṃkesa ati bala garba | kie basya sura gaṃdharba |
muni siddha nara khaga nāga | haṭhi pantha saba keṃ lāga ||

113.छं॰ 3छन्द

घर-द्रोह-रत अति दुष्ट । पायो से फल पापिष्ट ।
अब सुनहु दीन दयाल । राजीव नयन-बिसाल ॥
मोहि रहा अति अभिमान । नहिँ कोउ मोहि समान ।
अब देखि प्रभु-पद-कञ्ज । गत मान-प्रद-दुख-पुञ्ज ॥

ghara-droha-rata ati duṣṭa | pāyo se phala pāpiṣṭa |
aba sunahu dīna dayāla | rājīva nayana-bisāla ||
mohi rahā ati abhimāna | nahim̐ kou mohi samāna |
aba dekhi prabhu-pada-kañja | gata māna-prada-dukha-puñja ||

113.छं॰ 4छन्द

कोउ ब्रह्म निर्गुन ध्याव । अव्यक्त जेहि श्रुति गाव ।
मोहि भाव कोसल भूप । श्रीराम सगुन सरूप ॥
बैदेहि अनुज समेत । मम हृदयँ करहु निकेत ।
मोहि जानिये निज दास । दे भक्ति रमा-निवास ॥

kou brahma nirguna dhyāva | avyakta jehi śruti gāva |
mohi bhāva kosala bhūpa | śrīrāma saguna sarūpa ||
baidehi anuja sameta | mama hṛdayam̐ karahu niketa |
mohi jāniye nija dāsa | de bhakti ramā-nivāsa ||

113.छं॰ 5छन्द

दे भक्ति रमानिवास त्रास हरन सरन सुख दायकं ।
सुख-धाम राम नमामि काम अनेक छबि रघुनायकं ॥
सुर-वृन्द-रञ्जन द्वन्द भञ्जन, मनुज तनु अतुलितबलं ।
ब्रह्मादि सङ्कर सेब्य राम नमामि करुना-कोमलं ॥

de bhakti ramānivāsa trāsa harana sarana sukha dāyakaṃ |
sukha-dhāma rāma namāmi kāma aneka chabi raghunāyakaṃ ||
sura-vṛnda-rañjana dvanda bhañjana, manuja tanu atulitabalaṃ |
brahmādi saṅkara sebya rāma namāmi karunā-komalaṃ ||

दो॰ 113दोहा

अब करि कृपा बिलोकि मोहि, आयसु देहु कृपाल ।
काह करउँ सुनि प्रिय बचन, बोले दीनदयाल ॥

aba kari kṛpā biloki mohi, āyasu dehu kṛpāla |
kāha karaum̐ suni priya bacana, bole dīnadayāla ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0