लंकाकाण्ड

अध्याय 114: मृत वानरों का जीवित होना, शिवजी का आगमन

7 श्लोक · 114 में से 121

इस अध्याय में क्या होता है

मृत वानरों का जीवित होना, शिवजी का आगमन

प्रभु कहते हैं: सुरपति, मेरे जो भालू-वानर निशाचरों के हाथों मरकर धरती पर पड़े हैं, उन्होंने मेरे लिए प्राण दिए; उन सबको जिला दो। काकभुशुण्डि गरुड़ से कहते हैं: प्रभु स्वयं तीनों लोक जिला सकते थे, पर बड़ाई इन्द्र को दी। इन्द्र अमृत बरसाते हैं और भालू-वानर हर्षित होकर उठ खड़े होते हैं। अमृत दोनों दलों पर बरसा, पर भालू-वानर जिए, निशाचर नहीं; क्योंकि मरते समय उनके मन में राम का आकार था, वे मुक्त होकर भव-बन्धन से छूट गए। राम जैसा दीनहितकारी कौन है? पापों का घर रावण भी वह गति पा गया जो श्रेष्ठ मुनि नहीं पाते। देवता विमानों में चले जाते हैं, और सुअवसर देखकर शम्भु विनती करने आते हैं।

114.1

सुनु सुरपति कपि भालु हमारे । परे भूमि निसचरन्हि जे मारे ॥
मम हित लागि तजे इन्ह प्राना । सकल जिआउ सुरेस सुजाना ॥

sunu surapati kapi bhālu hamāre | pare bhūmi nisacaranhi je māre ||
mama hita lāgi taje inha prānā | sakala jiāu suresa sujānā ||

114.2

सुनु खगेस प्रभु के यह बानी । अति अगाध जानहिँ मुनि-ज्ञानी ॥
प्रभु सक त्रिभुवन मारि जिआई । केवल सक्रहि दीन्हि बड़ाई ॥

sunu khagesa prabhu ke yaha bānī | ati agādha jānahim̐ muni-jñānī ||
prabhu saka tribhuvana māri jiāī | kevala sakrahi dīnhi bar̤āī ||

114.3

सुधा बरषि कपि भालु जिआये । हरषि उठे सब प्रभु पहिँ आये ॥
सुधाबृष्टि भै दुहु दल ऊपर । जिये भालु कपि नहिँ रजनीचर ॥

sudhā baraṣi kapi bhālu jiāye | haraṣi uṭhe saba prabhu pahim̐ āye ||
sudhābṛṣṭi bhai duhu dala ūpara | jiye bhālu kapi nahim̐ rajanīcara ||

114.4

रामाकार बसहु तिन्ह के मन । मुक्त भये छूटे भव-बन्धन ॥
सुर-अंसिक सब कपि अरु रीछा । जिये सकल रघुपति कीं ईछा ॥

rāmākāra basahu tinha ke mana | mukta bhaye chūṭe bhava-bandhana ||
sura-aṃsika saba kapi aru rīchā | jiye sakala raghupati kīṃ īchā ||

114.5

राम सरिस को दीन-हितकारी । कीन्हे मुकुत निसाचर कारी ॥
खल भल-धाम काम-रत रावन । गति पाई जो मुनिबर पाव न ॥

rāma sarisa ko dīna-hitakārī | kīnhe mukuta nisācara kārī ||
khala bhala-dhāma kāma-rata rāvana | gati pāī jo munibara pāva na ||

दो॰ 114 (क)दोहा

दो सुमन बरषि सब सुर चले, चढ़ि चढ़ि रुचिर बिमान ।
देखि सुअवसर राम पहिँ, आये सम्भु सुजान ॥

do sumana baraṣi saba sura cale, car̤hi car̤hi rucira bimāna |
dekhi suavasara rāma pahim̐, āye sambhu sujāna ||

दो॰ 114 (ख)दोहा

परम-प्रीति कर जोरि जुग, नलिन-नयन भरि बारि ।
पुलकित-तनु गदगद गिराँ, विनय करत त्रिपुरारि ॥

parama-prīti kara jori juga, nalina-nayana bhari bāri |
pulakita-tanu gadagada girām̐, vinaya karata tripurāri ||

पाठ का स्रोत: Wikisource · Public domain (Tulsidas, 16th c.; 1925 edition, Wikisource PD-1996 tag); transcription CC BY-SA 4.0